छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में बिजली व्यवस्था अब केवल तकनीकी खराबी का मामला नहीं रह गई है , बल्कि यह घोर प्रशासनिक लापरवाही , कमज़ोर मॉनिटरिंग और बड़े अधिकारियों की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुकी है।
4 अगस्त 2026 की रात करीब 1 बजे से शहर के कई इलाकों में बिजली गुल होने की शिकायतें सामने आई। बरसात का मौसम , हवा में अत्यधिक नमी , उमस से बेहाल लोग और ऊपर से घंटों बिजली गायब।
घरों में बुजुर्ग परेशान हैं , छोटे बच्चे बेचैन हैं , मरीज़ों की मुश्किलें बढ़ रही हैं और बिजली बंद होते ही मच्छरों का आतंक कई गुना बढ़ जाता है।
बिलासपुर के जनप्रतिनिधियों (नेताओं) और प्रदेश में AC चैंबरों में बैठे बड़े अधिकारियों से जनता पूछ रही है कि , क्या बिलासपुर के लोगों को अब हर बारिश में अंधेरे , उमस और मच्छरों के बीच रात गुजारने के लिए छोड़ दिया गया है ?
ऊर्जा विभाग की समीक्षा बैठक–फटकार हुई , लेकिन व्यवस्था नहीं सुधरी !
हाल ही में बिजली व्यवस्था को लेकर हुई समीक्षा बैठक में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनियों के चेयरमैन सुबोध कुमार सिंह ने बिलासपुर की बिजली व्यवस्था पर अधिकारियों को फटकार लगाई थी। सुबोध कुमार सिंह ने बैठक में यह चिंता जाहिर की थी कि बिजली कटौती और बार–बार ट्रिपिंग की बड़ी संख्या में शिकायतें सबसे ज्यादा बिलासपुर से ही क्यों आ रही हैं ? लेकिन सवाल यह है कि फटकार के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं सुधरी ? ऐसा लगता है कि सुबोध सिंह की समीक्षा बैठक सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए ही की गई थी! बिलासपुर के ऊर्जा विभाग के बड़े अधिकारियों को इस समीक्षा बैठक से कोई वास्ता नहीं रहा बल्कि दिन ब दिन बिजली की व्यवस्था चरमराती दिख रही है।

मुख्यमंत्री के ऊर्जा विभाग में ही व्यवस्था क्यों बेपटरी ?
ऊर्जा विभाग मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के अधीन है , ऐसे में बिलासपुर की लगातार बिगड़ती बिजली व्यवस्था मुख्यमंत्री के विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। अगर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के विभाग में ही उपभोक्ता को निर्बाध बिजली नहीं मिल पा रही है , तो फिर आम जनता अपनी शिकायत लेकर आखिर किसके पास जाए ? इससे यह समझ में आता है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के ऊर्जा विभाग में बैठे बड़े अधिकारी किस कदर लगातार मनमानी कर रहे हैं। साफ संकेत मिलते हैं कि बिजली व्यवस्था को सम्हालने में यह बड़े अधिकारी पूरी तरह नाकाम हो चुके हैं।
कर्मचारी कम हैं या व्यवस्था की प्लानिंग फेल ?
abc newz ने जब बिजली विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की , तो कर्मचारियों की लगभग 25% कमी का तर्क सामने आया। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर कर्मचारियों की कमी है , तो वर्षों से रिक्त पद क्यों नहीं भरे गए। बारिश से पहले अतिरिक्त लाइन स्टाफ और फॉल्ट– रिपेयरिंग टीम की व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? क्या शहर की बढ़ती आबादी और बिजली की बढ़ती मांग के अनुसार नया इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया ? क्या केवल कर्मचारियों की कमी बताकर हर बार बिजली कटौती से जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी ?

बिलासपुर एक तेज़ी से बढ़ता शहर है। नए कॉलोनी क्षेत्र , आउटर वार्ड , व्यावसायिक प्रतिष्ठान और घरेलू बिजली उपकरण लगातार बढ़ रहे हैं। बिलासपुर को स्मार्ट सिटी का दर्जा भी प्राप्त है , ये अलग बात है कि आज तक कोई भी प्रोजेक्ट स्मार्ट नहीं बन सका , लगभग सारे प्रोजेक्ट फेल हो चुके हैं , चारों तरफ भ्रष्टाचार की बू नज़र आती है। सिस्टम पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। देखने से ऐसा लगता है कि जनता के टैक्स के पैसों को चारों तरफ से खूब लूटा गया है।
बिलासपुर के आउटर इलाकों में भी बिजली व्यवस्था ध्वस्त !
बिलासपुर शहर के साथ–साथ आउटर क्षेत्रों में भी बिजली कटौती को लेकर लोगों में नाराज़गी है। मोपका क्षेत्र , सकरी , तिफरा , बिल्हा विधानसभा क्षेत्र से जुड़े आउटर वार्ड और कई निचली बस्तियों में बिजली की समस्या लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को तबाह कर रही है। स्थानीय लोग बड़े ही गुस्से में कहते हैं कि विभाग को बिजली का बिल समय पर चाहिए , लेकिन बिजली समय पर क्यों नहीं मिलती।

अंत में , बिलासपुर की जनता लगातार पूछ रही है , अधिकारियों के राजनीतिक आश्वासन से अब काम नहीं चलेगा , उसे निर्बाध बिजली चाहिए , समीक्षा बैठक की फटकार नहीं , ज़मीन पर सुधार चाहिए। कर्मचारियों की कमी का बहाना नहीं , स्थाई समाधान चाहिए। और अगर विभाग में करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी शहर अंधेरे में डूब रहा है , तो जनता यह सवाल जरूर पूछेगी कि बिजली व्यवस्था के लिए आया पैसा आखिर किसकी जेब में जा रहा है , बिलासपुर अंधेरे में क्यों है , और इस विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा।

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