abc newz । विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के शहरों को हर सुबह साफ–सुथरा रखने वाली स्वच्छता दीदियां आज भी अपने सम्मानजनक जीवन और उचित मानदेय के लिए संघर्ष कर रही हैं। वर्षों से अलग–अलग सरकारें बदलीं , लेकिन मूल मांगें आज भी अधूरी हैं।
रमन सिंह सरकार हो , भूपेश बघेल सरकार हो या वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार–हर दौर में स्वच्छता दीदियों ने अपने मानदेय और सुविधाओं को लेकर आवाज़ उठाई है। वर्तमान सरकार ने मानदेय बढ़ाकर 8000 हजार रुपए किया और भुगतान सुनिश्चित करने के लिए करोड़ों रुपए स्वीकृत भी किए , लेकिन स्वच्छता दीदियों का कहना है कि इतनी कम राशि उनके कठिन परिश्रम के आगे कुछ भी नहीं है।

स्वच्छता दीदियां क्या–क्या काम करती हैं ?
* इनका कार्य अत्यंत कठिन और स्वास्थ्य जोखिम वाला माना जाता है।
* घर–घर जाकर कचरा संग्रह करना।
* गीले और सूखे कचरे का अलग–अलग संग्रह।
* SLRM (solid liquid resource management) में कचरे की छंटाई।
* प्लास्टिक , कांच , धातु आदि का पृथककरण।
* कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया में सहयोग।
* वार्डों में स्वच्छता जागरूकता अभियान।
* डोर टू डोर यूजर चार्ज संग्रह (कई निकायों में)
* स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्यों को पूरा करने में सहयोग।

स्वच्छता दीदियों की प्रमुख मांगें
* विभिन्न संगठनों द्वारा समय–समय पर रखी गई प्रमुख मांगें :
* 8000 के बजाय कलेक्टर दर या न्यूनतम मजदूरी के अनुसार भुगतान।
* नियमित कर्मचारी का दर्ज़ा।
* ESI , PF एवं सामाजिक सुरक्षा।
* साप्ताहिक अवकाश।
* मातृत्व एवं चिकित्सा अवकाश।
* सुरक्षा उपकरण (दस्ताने , मास्क , जूते)
* समय पर वेतन भुगतान।
* छुट्टी लेने पर अत्यधिक वेतन कटौती बंद हो।
* दुर्घटना एवं स्वास्थ्य बीमा।
सरकार वेतन क्यों नहीं बढ़ाती ?
सरकार का तर्क सामान्यतः यह रहता है कि :
* स्वच्छता दीदियां नियमित कर्मचारी नहीं बल्कि स्व–सहायता समूह के माध्यम से कार्यरत हैं।
* नगरीय निकायों की वित्तीय क्षमता सीमित है।
* मानदेय का भुगतान राज्य और निकायों के बजट पर निर्भर करता है।
दूसरी ओर कर्मचारी संगठन कहते हैं कि कार्य की रूपरेखा स्थाई है , इसलिए उन्हें नियमित कर्मियों जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन नेताओं और अधिकारियों पर इस व्यवस्था की जिम्मेदारी है , क्या वे समय–समय पर स्वच्छता दीदियों की समस्याओं की समीक्षा करते हैं ? क्या राज्य सरकार , नगरीय प्रशासन विभाग , नगर निगम आयुक्त और नगर पालिका के CMO ने उनकी मांगों के स्थाई समाधान के लिए कोई रोडमैप तैयार किया है ?

महिला सशक्तिकरण की बात और स्वच्छता दीदियों की हकीकत
देश में महिला सशक्तिकरण की बात बहुत जोरों–शोरों से होती है। बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ की बात होती है। महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की बात होती है। महिलाओं को रोज़गार देने की बात होती है। सरकारें महिलाओं के लिए योजनाएं बनाती हैं। लेकिन दूसरी तरफ हज़ारों महिलाएं ऐसी हैं जो रोज़ अपने श्रम से शहरों की स्वच्छता व्यवस्था को चलाने में योगदान देती हैं और फिर भी सम्मानजनक आय के लिए संघर्ष करती हैं।
अब सवाल सरकार से है
महिला सशक्तिकरण सिर्फ भाषण और पोस्टर तक रहेगा या उन महिलाओं की आय बढ़ाने तक भी पहुंचेगा जो रोज़ शहर की सफाई व्यवस्था में काम कर रही हैं ?

जो महिलाएं पूरे शहर को स्वच्छ रखने के लिए रोज मेहनत करती हैं , उनका जीवन सम्मानजनक होना चाहिए। स्वच्छ शहर की कीमत सिर्फ साफ सड़कें नहीं हैं , उसके पीछे मेहनत करने वाली स्वच्छता दीदी का सम्मान भी है।
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