छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में पत्रकारों की एक बड़ी संस्था माने जाने वाले ” प्रेस क्लब ” के भीतर इन दिनों कथित रूप से गुटबाजी , पदाधिकारियों के बीच खींचतान और अधिकारों को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। जानकारी के अनुसार प्रेस क्लब के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष एक पक्ष में हैं , जबकि सचिव और कोषाध्यक्ष दूसरे पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
मामला केवल आगामी मतभेद तक सीमित नहीं बताया जा रहा। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की ओर से सचिव और कोषाध्यक्ष को पद से हटाने या निष्कासित करने संबंधी कार्यवाही किए जाने की बात सामने आई है। वहीं दूसरी ओर सचिव और कोषाध्यक्ष ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर प्रेस क्लब की आय–व्यय , खर्चों और वित्तीय ब्यौरे की विधिसम्मत जांच या कार्यवाही की मांग किए जाने की बात कही है।
अब सवाल यह है कि आखिर प्रेस क्लब के भीतर ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारों की संस्था के पदाधिकारी एक–दूसरे के खिलाफ कार्यवाही और प्रशासन के दरवाज़े तक पहुंच गए ? क्या यह केवल पदों और अधिकारों की लड़ाई है ? क्या प्रेस क्लब के संचालन , नियमों और पारदर्शिता को लेकर मतभेद है ? या फिर प्रेस क्लब की आय–व्यय और खर्चों को लेकर उठे सवालों का मामला है ?

इन सवालों का जवाब संबंधित पक्षों और दस्तावेजों से स्पष्ट होना जरूरी है। क्योंकि किसी भी संस्था के ऊपर आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना , दोनों अलग–अलग बातें हैं। इसलिए निष्पक्ष जांच , रिकॉर्ड की जांच और सभी पक्षों का जवाब सामने आना जरूरी है।
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यह है कि , यदि पत्रकारों की संस्था ही लगातार कई गुटों में बंटी रहे , तो उसका नुकसान केवल पत्रकारों तक सीमित रहेगा या फिर जनता तक भी पहुंचेगा ?
प्रेस को लोकतंत्र का ” चौथा स्तंभ ” कहा जाता है। पत्रकार का काम सत्ता से सवाल करना , प्रशासन की कमियों को उजागर करना , भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर नज़र रखना तथा आम जनता की आवाज़ को शासन और प्रशासन तक पहुंचाना है।
बिलासपुर प्रेस क्लब में लगभग 450 पंजीकृत सदस्य होने की बात कही जाती है। इतनी बड़ी सदस्य संख्या वाली संस्था में यदि लगातार गुटबाज़ी बनी रहती है , तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
पहला परिणाम–पत्रकारों की एकजुटता कमज़ोर हो सकती है
जब पत्रकार अलग–अलग गुटों में बंट जाते हैं , तो पत्रकारों के अधिकार , सुरक्षा , सम्मान , सुविधाओं और समस्याओं को लेकर सामूहिक आवाज़ कमज़ोर पड़ सकती है।
दूसरा परिणाम–जनहित के मुद्दे पीछे छूट सकते हैं
जिस समय पत्रकारों को शहर की खराब सड़कें , बिजली संकट , जलभराव , सरकारी योजनाओं में अनियमितता , भ्रष्टाचार , शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाना चाहिए , उस समय यदि संस्था का बड़ा हिस्सा आपसी विवाद में उलझ जाए , तो जनता के सवाल कौन उठाएगा ?
तीसरा परिणाम–प्रेस क्लब की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
यदि प्रेस क्लब के पदाधिकारी एक–दूसरे पर आरोप लगाएं और आय–व्यय को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठें , तो आम नागरिकों के मन में यह प्रश्न पैदा हो सकता है कि जो पत्रकार दूसरों से पारदर्शिता की मांग करते हैं , क्या उनकी अपनी संस्था में भी उतनी ही पारदर्शिता है ?
चौथा परिणाम–युवा और नए पत्रकारों को नुकसान हो सकता है।

प्रेस क्लब केवल पदाधिकारियों की संस्था नहीं है। यह नए पत्रकारों के मार्गदर्शन , प्रशिक्षण , पहचान , सहयोग और पत्रकारिता के मूल्यों को मजबूत करने का मंच भी होना चाहिए। लेकिन यदि संस्था लंबे समय तक विवादों में उलझी रहे , तो नए पत्रकारों को सही मंच और सहयोग मिलने में कठिनाई हो सकती है।
पांचवां परिणाम–प्रशासन और सत्ता के सामने पत्रकारों की सामूहिक ताकत कमज़ोर हो सकती है।
जब पत्रकार एकजुट होते हैं , तो जनहित के बड़े मुद्दों पर उनकी आवाज़ बुलंद होती है। लेकिन यदि संगठन कई गुटों में बंट जाए , तो सत्ता और प्रशासन के सामने पत्रकारों की सामूहिक भूमिका कमज़ोर पड़ने की आशंका रहती है।
abc newz का मानना है कि प्रेस क्लब किसी एक अध्यक्ष , उपाध्यक्ष , सचिव या कोषाध्यक्ष की निजी संस्था नहीं है। यह सभी पंजीकृत सदस्यों की सामूहिक संस्था है। इसलिए किसी भी विवाद का समाधान , नियमों , संविधान , बैठक की वैध प्रक्रिया , लिखित रिकॉर्ड और लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए।
और यदि कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर जांच या विधिसम्मत कार्यवाही की मांग की गई है , तो प्रशासन को भी उपलब्ध दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए।
आज बिलासपुर के पत्रकारों के सामने सबसे बड़ा सवाल पदों का नहीं , प्रेस क्लब की साख बचाने का है। सवाल यह नहीं कि कौन सा गुट जीतेगा। सवाल यह है कि क्या प्रेस क्लब की एकता बचेगी ? क्या 450 सदस्यों की आवाज़ को आने वाले समय में सम्मान मिलेगा ? क्या आय–व्यय का पारदर्शी हिसाब सामने आएगा ? क्या विवाद का अंत लोकतांत्रिक और विधिसम्मत तरीके से होगा ?
जब ” चौथे स्तंभ ” के भीतर ही दरार गहरी हो जाए , तो जनता की आवाज़ को मजबूती से कौन उठाएगा ?
बिलासपुर प्रेस क्लब का विवाद केवल पत्रकारों का आंतरिक मामला नहीं रहना चाहिए। क्योंकि अगर पत्रकारों की सामूहिक आवाज़ कमज़ोर होती है तो अंततः जनहित के मुद्दों को उठाने वाली आवाज़ भी कमज़ोर पड़ सकती है।
अब जरूरत आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर पारदर्शिता , संवाद , निष्पक्ष जांच और लोकतांत्रिक समाधान की है। क्योंकि प्रेस की ताकत उसकी इमारत में नहीं–उसकी एकता , विश्वसनीयता और जनता के प्रति जवाबदेही में होती है।
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