बिलासपुर : (छत्तीसगढ़) आज हम एक ऐसे मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं , जो केवल पत्रकारों का नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र और आम जनता का है।
लोकतंत्र में पत्रकारों को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार जनता की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने का माध्यम होता है। लेकिन अगर ज़िम्मेदार अधिकारी ही पत्रकारों का फोन उठाना बंद कर दें , तो आम जनता की आवाज़ आखिर पहुंचेगी कैसे ?
बिलासपुर सहित छत्तीसगढ़ के कई हिस्से से लगातार ऐसी खबरें आतीं हैं कि कई वरिष्ठ अधिकारी–विशेषकर प्रमुख सचिव , सचिव और विभागाध्यक्ष (HOD) स्तर के अधिकारी पत्रकारों के फोन का जवाब कई दिनों और महीनों नहीं देते। यदि ऐसा लगातार होता है , तो इससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
दूसरी ओर , कई जिलों में ऐसे अधिकारी भी हैं जो संवाद बनाए रखते हैं। उदाहरण के तौर पर , बिलासपुर के कलेक्टर संजय अग्रवाल के बारे में अनेक पत्रकार यह कहते हैं कि वे अक्सर फोन उठाकर समस्याएं सुनते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि संवाद संभव है , यदि प्रशासन चाहे।
अब सवाल उन विभागों पर है जहां जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दे उठते रहते हैं।
यदि सिंचाई परियोजनाओं में गंभीर गड़बड़ियों की शिकायतें हैं , नहर लाइनिंग की गुणवत्ता पर सवाल है , किसान परेशान है , और पत्रकार संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना चाहते हैं , लेकिन उन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती , तो जवाबदेही कैसे तय होगी ?
इसी प्रकार यदि स्कूलों की जर्जर बिल्डिंग , शौचालयों की खराब स्थिति , मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता या बच्चों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी अधिकारी संवाद न करें , तो जनता का विश्वास प्रशासन पर कैसे कायम रहेगा ?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी जनता के सेवक होते हैं। उनका दायित्व केवल फाइलों का निपटारा करना नहीं , बल्कि जनता और मीडिया के प्रश्नों का यथासंभव उत्तर देना भी है। हर अधिकारी हर समय फोन उठा पाए , यह व्यावहारिक नहीं है , लेकिन लगातार फोन न उठाना और संवाद से बचना या उचित माध्यम से भी जवाब न देना , पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े कर सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल–समाधान क्या हो सकता है ?
* प्रत्येक विभाग में मीडिया और जनसंपर्क के लिए समय तय हो।
* यदि अधिकारी कॉल नहीं उठा पाते , तो निर्धारित समय के भीतर कॉल बैक या लिखित उत्तर देने की व्यवस्था हो।
* विभागीय स्तर पर मीडिया हेल्पलाइन और आधिकारिक प्रवक्ता की व्यवस्था हो।
* लगातार संवाद से बचने की शिकायतों की समीक्षा वरिष्ठ स्तर पर की जाए।
* पत्रकारों के प्रश्नों का समयबद्ध उत्तर देने के लिए स्पष्ट प्रशासनिक दिशा–निर्देश बनाए जाएं।
* मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्य सचिव कार्यालय समय–समय पर विभागों की मीडिया रिस्पॉन्स प्रणाली की समीक्षा करें।
छत्तीसगढ़ में आजकल अक्सर ये देखने को मिलता है कि ज्यादातर विभागों के बड़े स्तर के अधिकारी पत्रकारों से संवाद करने के मामले में दूरी बनाना पसंद करते हैं , कई दिनों और यहां तक कि महीनों तक पत्रकारों का फोन उठाना मुनासिब नहीं समझते। ये बड़े अधिकारियों का अहंकार ही दर्शाता है। अगर बड़े अधिकारी पत्रकारों का फोन नहीं उठा रहे हैं तो ये आम जनता से कैसे पेश आते होंगे , ये आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।
abc newz का उद्देश्य किसी विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि जनहित से जुड़े प्रश्नों पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता को सामने रखना है। लोकतंत्र में संवाद जितना मजबूत होगा , जनता का विश्वास भी उतना ही मजबूत होगा।
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