abc newz । विशेष रिपोर्ट
भारत में हाल ही में हुए छात्र आंदोलन ने यह दिखा दिया कि 21वीं सदी में कोई भी बड़ा जनांदोलन केवल सड़कों पर नहीं , बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ा जाता है। जिस तरह पहले आंदोलनों की पहचान अखबारों , पोस्टरों और टीवी कवरेज से होती थी , उसी तरह आज सोशल मीडिया जनसमर्थन जुटाने का सबसे तेज़ माध्यम बन चुका है।

जंतर–मंतर छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी–डिजिटल नेटवर्किंग। छात्र एक शहर तक सीमित नहीं रहे। दिल्ली से लेकर बेंगलुरु , पुणे , हैदराबाद , कोलकाता , बिहार , महाराष्ट्र और देश के कई अन्य शहरों तक संदेश कुछ ही मिनटों में पहुंचने लगा। विदेशों में रहने वाले कई भारतीय छात्रों ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी एकजुटता व्यक्त की।
* अब सवाल यह है कि आखिर इंस्टाग्राम सबसे आगे कैसे निकल गया ??
* डिजिटल मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई कारण हैं।
सबसे पहला कारण है रील (reels) आधारित संचार। 30 सेकंड्स से 90 सेकंड्स के छोटे वीडियो तेजी से लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें साझा करना आसान होता है। आंदोलन के हर छोटे–बड़े घटनाक्रम को तुरंत वीडियो के रूप में प्रकाशित किया गया।

दूसरा कारण है विज़ुअल स्टोरीटेलिंग (visual story telling)। तस्वीरें , छोटे वीडियो , पोस्टर , लाइव वीडियो और carousel post (जिसमें एक ही बार में कई सारी तस्वीरें या वीडियो अपलोड किए जाते हैं) के माध्यम से संदेश अधिक प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किए गए। इससे केवल जानकारी ही नहीं , भावनात्मक जुड़ाव भी बना।
तीसरा कारण है युवा दर्शकों की मौजूदगी। भारत में बड़ी संख्या में छात्र और युवा प्रतिदिन इंस्टाग्राम का उपयोग करते हैं। इसलिए आंदोलन का संदेश उसी वर्ग तक सबसे पहले और सबसे तेज़ी से पहुंचा , जो उसका मुख्य केंद्र था।

चौथा कारण है एल्गोरिदम और शेयरिंग। यदि किसी विषय पर बड़ी संख्या में लोग लगातार पोस्ट , रील और स्टोरी साझा करते हैं , तो प्लेटफॉर्म उस सामग्री को और अधिक लोगों तक पहुंचा सकता है। इससे आंदोलन की दृश्यता बढ़ गई।
अगर तुलना करें , तो X (पूर्व में ट्विटर) पर चर्चा तेज़ी से होती है और पत्रकारों , नेताओं तथा नीति–निर्माताओं तक संदेश जल्दी पहुंचता है। फेसबुक पर अलग–अलग आयु वर्ग के लोग सक्रिय हैं , लेकिन युवाओं के बीच उसकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं दिखती है। you tube विस्तृत वीडियो और विश्लेषण के लिए प्रभावी मंच है , लेकिन तुरंत और वायरल प्रचार के मामले में छोटे वीडियो वाले प्रारूप अक्सर अधिक तेज़ी से फैलते हैं। दूसरी ओर , इंस्टाग्राम ने छोटे वीडियो , स्टोरी , लाइव और शेयरिंग जैसी सुविधाओं के कारण युवाओं तक तेज़ पहुंच बनाई।

हालांकि ये भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी आंदोलन के व्यापक होने का श्रेय केवल एक सोशल मीडिया प्लेटफार्म को नहीं दिया जा सकता। वास्तविक प्रदर्शन , संगठन , मीडिया कवरेज , स्थानीय सभाएं और लोगों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सोशल मीडिया इन प्रयासों को गति और व्यापक पहुंच देने का माध्यम बनता है।
जंतर–मंतर के आंदोलन ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि आधुनिक भारत में जन आंदोलन की नई तस्वीर डिजिटल और ज़मीनी दोनों स्तरों पर तैयार होती है। जहां पहले पोस्टर और पर्चे आंदोलन की पहचान थे , वहीं आज रील , लाइव वीडियो , हैशटैग और मोबाइल फोन लोकतांत्रिक संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

यही वजह है कि आज किसी भी बड़े आंदोलन की कहानी केवल धरना स्थल पर नहीं लिखी जाती , बल्कि लाखों मोबाइल स्क्रीन्स पर भी एक साथ दिखाई देती है।
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