छत्तीसगढ़ का बिलासपुर , जिसे देश की स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का सपना दिखाया गया था , 16 से 17 जुलाई की मूसलाधार बारिश में पूरी तरह पानी में डूब गया। कई इलाकों में घरों में पानी घुस गया , SDRF को रेस्क्यू करना पड़ा , बिजली सब–स्टेशनों में पानी भर गया और कई क्षेत्रों में 9–10 घंटे तक ब्लैकआउट रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर करोडों रुपए खर्च होने के बावजूद शहर बारिश में कैसे डूब गया ? संभागीय आयुक्त , कलेक्टर और निगम आयुक्त के सरकारी बंगले भी डूबे हुए नज़र आए , हमेशा की तरह उनके बंगलों से सबसे पहले पानी निकासी की व्यवस्था करवाई गई। नगर निगम को आपातकालीन बाढ़ कंट्रोल रूम तक खोलना पड़ा।
स्मार्ट सिटी कब बनी बिलासपुर ?
बिलासपुर का चयन भारत सरकार के smart city mission के तीसरे राउंड में 23 जून 2017 को हुआ था। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत सामान्य वित्तीय ढांचा का आकर केंद्र सरकार , राज्य सरकार और नगर निगम की राशि तय करते हैं। इन तीनों का शेयर अलग–अलग होता है। बिलासपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड में शुरुआती रूप में लगभग 1000 करोड़ के बजट के कार्य कराए गए। इस बजट के अतिरिक्त विभिन्न परियोजनाओं के लिए अन्य स्रोतों , अभिसरण (convergence) , PPP मॉडल तथा ऋण से भी धन उपलब्ध कराया जाता है।

लेकिन सवाल यह है कि पैसा गया कहां ?
बिलासपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के अंतर्गत (जिसके निगम आयुक्त MD होते हैं) यदि शहर स्मार्ट बन रहा था , तो सड़कें क्यों डूब गईं ? बिजली सब–स्टेशन क्यों जलमग्न हो गए ? नालियां ओवरफ्लो क्यों हुई ? बारिश का पानी निकल क्यों नहीं पाया ? SDRF को शहर के अंदर रेस्क्यू क्यों करना पड़ा ? इसका उत्तर केवल बारिश नहीं , बल्कि urban drainage planning है।
अर्बन प्लानिंग में सबसे बड़ी गलती क्या होती है ?
किसी भी आधुनिक शहर की योजना बनाते समय सबसे पहले storm water drainage master plan बनाया जाता है। इसमें निम्न बातें अनिवार्य होती हैं….
* पूरे शहर का डिजिटल टोपोग्राफिक सर्वे।
* ऊंचाई और ढलान (gradient) का वैज्ञानिक विश्लेषण।
* पानी किस दिशा में बहेगा , उसका मॉडल।
* कितनी वर्षा होगी , उसका डिज़ाइन मानक ।
* मुख्य नाले , सेकेंडरी ड्रेन और नालियों का नेटवर्क।
अंतिम निकास (outfall) नदी , झील या प्राकृतिक नाले तक।
यदि इनमें से कोई भी कड़ी टूटती है तो शहर में वॉटर लॉगिंग निश्चित है।
बिलासपुर में वॉटर लॉगिंग के संभावित तकनीकी कारण
प्राकृतिक नालों पर अतिक्रमण , नालियों की क्षमता कम होना , ड्रेनेज नेटवर्क का आपस में कनेक्ट न होना , नियमित डी–सिल्टिंग नहीं होना , सड़कें ऊंची होती गईं लेकिन कॉलोनियां नीचे रह गईं , बरसाती पानी और सीवरेज का मिश्रित प्रवाह , आउटफॉल पॉइंट पर बैक फ्लो , नए निर्माण लेकिन पुराना ड्रेनेज। मास्टर प्लान और वास्तविक विकास में अंतर , अत्यधिक कंक्रीटीकरण , जिससे पानी ज़मीन में नहीं समाता।

सीवरेज और स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज में अंतर
यही सबसे बड़ी तकनीकी गलती होती है , सीवरेज सिस्टम केवल घरों का गंदा पानी ले जाने के लिए होता है। जबकि स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम केवल वर्षा जल निकालने के लिए बनाया जाता है। यदि दोनों को अलग –अलग डिज़ाइन नहीं किया गया या रखरखाव नहीं हुआ , तो भारी बारिश में पूरा शहर डूब सकता है।
बिजली सब –स्टेशन क्यों डूबे ?
किसी भी विद्युत सब–स्टेशन का निर्माण सामान्यतः ऐसे स्थान पर किया जाता है जहां पर्याप्त ऊंचाई हो , चारों ओर ड्रेनेज हो , वर्षा जल तुरंत बाहर निकल सके। यदि बिजली सब–स्टेशन में पानी भर गया , तो यह केवल बिजली विभाग का नहीं बल्कि समेकित शहरी नियोजन (integrated urban planning) का भी विषय है।
नगर निगम की इंजीनियरिंग मशीनरी की भूमिका
नगर निगम में चीफ इंजीनियर , अधीक्षण अभियंता , कार्यपालन अभियंता , सहायक अभियंता , उप अभियंता और अन्य तकनीकी अधिकारी मिलकर सड़क , नाली , पुलिया , ड्रेनेज , जल निकासी , भवन अनुमति, शहरी विकास से जुड़े कार्यों की योजना और निगरानी करते हैं।
यदि हर वर्ष एक जैसी समस्या दोहराई जाती है , तो केवल बारिश को दोष देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता , आवश्यकता होती है ड्रेनेज ऑडिट , हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन , जिम्मेदारी तय करने और दीर्घकालीन मास्टर प्लान लागू करने की।
आदर्श अर्बन प्लानिंग कैसी होती है ?
एक वैज्ञानिक शहर में…. वर्षा का पानी 30 से 60 मिनट के भीतर मुख्य ड्रेन तक पहुंच जाए , मुख्य ड्रेन से नदी तक निर्बाध प्रवाह रहे , हर कॉलोनी का अलग स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क हो , वर्षा जल संचयन अनिवार्य हो , बाढ़ संभावित क्षेत्रों का GIS मैप तैयार हो , हर वर्ष मानसून पूर्व de silting हो , प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण न हो , सड़क निर्माण से पहले ड्रेनेज डिज़ाइन तैयार हो।

अब जनता के सवाल
ड्रेनेज मास्टर प्लान कैसे फेल हो गया ? स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क कितना बना ? कितने नालों का चौड़ीकरण हुआ ? कितनी de-silting हुई ? किन क्षेत्रों को flood जोन घोषित किया गया ? हर वर्ष जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थाई समाधान क्यों नहीं हुआ ? स्मार्ट सिटी के प्रदर्शन का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कब होगा ? नगर निगम की इंजीनियरिंग कैसे फेल हो गई ?
यह बात तो सही है कि बारिश प्राकृतिक है। लेकिन शहर का डूबना अक्सर केवल प्राकृतिक नहीं , बल्कि योजना , निर्माण , रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न बन जाता है। बिलासपुर की हालिया स्थिति एक बड़े तकनीकी और प्रशासनिक फेल्योर की कहानी बयां कर रही है। हाल की घटना को देखकर ऐसा लगता है कि बिलासपुर शहर को सम्हाल पाने में तमाम नेता और अधिकारी पूरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं। नेताओं की नेतृत्व क्षमता और अधिकारियों की कुशल प्रशासनिक क्षमताओं पर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। आने वाले समय में जनता इनसे लगातार सवाल करती रहेगी कि आखिर टैक्स का पैसा बड़े पैमाने पर किसकी–किसकी जेब में गया।
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