भारत का संविधान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर आधारित है। इस व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है , प्रतिनिधि सरकार बनाते हैं और सरकार की नीतियों को लागू करने का दायित्व प्रशासनिक अधिकारियों यानी ब्यूरोक्रेसी पर होता है। संविधान का उद्देश्य यह नहीं है कि नौकरशाही राजनीतिक नेतृत्व का स्थान ले ले , बल्की दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए शासन चलाया जाए।
यदि किसी राज्य में ऐसी स्थिति बन जाए कि ब्यूरोक्रेसी निर्वाचित सरकार की लगातार अनदेखी करने लगे , मंत्रियों के निर्देशों को महत्व न दे , या स्वयं नीति निर्धारण जैसा व्यवहार करने लगे , तो इसका असर केवल सरकार पर नहीं , बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ सकता है।

संविधान के अनुसार शक्ति का बंटवारा
भारत में जनता सर्वोच्च है। जनता अपने मताधिकार से विधायक और सांसद चुनती है। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होते हैं। मंत्री नीति बनाते हैं , प्राथमिकता तय करते हैं , बजट का उपयोग किस दिशा में होगा यह तय करते हैं और जनता के प्रति राजनीतिक जवाबदेही निभाते हैं।
दूसरी ओर , भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) , भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और अन्य कैडर के सरकारी अधिकारी स्थाई कार्यपालिका के हिस्सा हैं। उनका मुख्य दायित्व कानून के अनुसार सरकार की नीतियों और योजनाओं का निष्पक्ष , ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन करना है। अधिकारी प्रशासनिक सलाह दे सकते हैं , कानूनी या वित्तीय आपत्तियां दर्ज़ कर सकते हैं , लेकिन अंतिम नीतिगत निर्णय सामान्यतः निर्वाचित सरकार का होता है , बशर्ते वह कानून और संविधान के अनुरूप हो।
ब्यूरोक्रेसी को कितनी स्वतंत्रता है ?
अधिकारियों को प्रशासनिक निर्णय लेने , कानून का पालन करने , रिकॉर्ड बनाए रखने , वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने , निष्पक्ष सलाह देने और अवैध आदेशों का पालन न करने का अधिकार है।
लेकिन अधिकारियों को यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर वैध सरकारी नीतियों को रोकें , राजनीतिक निर्णयों की जगह स्वयं नीति तय करें या लोकतांत्रिक जवाबदेही से ऊपर स्वयं को मान लें।

अगर नौकरशाही नेताओं पर हावी हो जाए तो क्या हो सकते हैं परिणाम ?
* सबसे पहला प्रभाव लोकतांत्रिक जवाबदेही पर पड़ सकता है। जनता ने जिस सरकार को चुना है , उसकी नीतियां ज़मीन पर लागू नहीं होंगी तो जनता का विश्वास लोकतंत्र से कमज़ोर हो सकता है।
* दूसरा , विकास परियोजनाओं में देरी बढ़ सकती है। यदि प्रशासनिक स्तर पर अनावश्यक विलंब या प्रतिरोध हो , तो सड़क , सिंचाई , शिक्षा , स्वास्थ और रोज़गार से जुड़ी योजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पातीं।
* तीसरा , सरकार और प्रशासन के बीच टकराव बढ़ने से निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है। फाइलें लंबे समय तक लंबित रह सकती हैं और शासन की गति प्रभावित हो सकती है।
* चौथा , जनता में भ्रम की स्थिति बन सकती है। यदि मंत्री कुछ घोषणा करें और अधिकारी उसका पालन न करें , तो नागरिक यह समझ ही नहीं पाते कि वास्तविक निर्णय लेने वाला कौन है।
* पांचवां , अधिकारियों की जवाबदेही भी कमज़ोर हो सकती है। मंत्री जनता के बीच जाकर जवाब देते हैं , चुनाव लड़ते हैं और हार–जीत का सामना करते हैं , जबकि अधिकारी चुनाव नहीं लड़ते। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम राजनीतिक जवाबदेही निर्वाचित नेतृत्व (elected representative) की मानी जाती है।

क्या नेताओं का कमज़ोर होना भी नुक़सानदायक हो सकता है ?
यदि निर्वाचित नेतृत्व प्रशासनिक व्यवस्था पर वैधानिक और प्रभावी नियंत्रण न रख पाए , तो शासन में नीति और क्रियान्वयन के बीच दूरी बढ़ सकती है।
कमज़ोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण विभागों में समन्वय घट सकता है , विकास कार्यों की प्राथमिकताएं स्पष्ट नहीं रह सकतीं , जनता की शिकायतों का समाधान धीमा हो सकता है और प्रशासन में जवाबदेही का संतुलन बिगड़ सकता है।
हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। यदि राजनीतिक नेतृत्व अधिकारियों पर अनुचित या गैरकानूनी दबाव डाले , तो अधिकारियों का दायित्व है कि वे कानून और संविधान के अनुसार कार्य करें। इसलिए मजबूत लोकतंत्र का अर्थ केवल मजबूत नेता नहीं , बल्कि कानून के दायरे में काम करने वाली निष्पक्ष और जवाबदेह ब्यूरोक्रेसी भी है।
लोकतंत्र में आदर्श व्यवस्था क्या है ?
विशेषज्ञों के अनुसार लोकतंत्र की सफलता का आधार टकराव नहीं बल्कि संतुलन है। निर्वाचित सरकार नीति बनाए , अधिकारी उसे कानून के अनुसार निष्पक्षता से लागू करें , और यदि किसी निर्णय में कानूनी समस्या हो तो अधिकारी लिखित सलाह दें। अंतिम निर्णय संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर राजनीतिक नेतृत्व का होता है।
भारत के संविधान ने न तो नेताओं को निरंकुश बनाया है और न ही नौकरशाही को सर्वोच्च। दोनों की भूमिकाएं अलग–अलग लेकिन एक दूसरे की पूरक हैं। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब राजनीतिक नेतृत्व जनता के प्रति जवाबदेह रहे , प्रशासन कानून के प्रति जवाबदेह रहे और दोनों मिलकर संविधान की भावना के अनुरूप शासन चलाएं। यदि किसी भी पक्ष का संतुलन बिगड़ता है , तो उसका प्रतिकूल प्रभाव शासन , विकास और अंततः आम जनता पर पड़ सकता है।
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