ECONOMICS : भारत में GDP (सकल घरेलू उत्पाद) देश में एक साल में बनी सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापकर निकाली जाती है। इसे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा तीन मुख्य तरीकों से गणना की जाती है : उत्पादन विधि, व्यय विधि और आय विधि।
उत्पादन विधि
इसमें सभी क्षेत्रों (जैसे कृषि, उद्योग, सेवा) के कुल उत्पादन मूल्य से मध्यवर्ती खपत घटाकर शुद्ध मूल्य निकाला जाता है। यह विधि बताती है कि अर्थव्यवस्था कितना उत्पादन कर रही है।
आय विधि
सभी लोगों की आय (income) जैसे मजदूरी, किराया, ब्याज, लाभ का योग GDP होता है। यह दिखाता है कि उत्पादन से कितनी कमाई हुई।
व्यय विधि
यह सबसे सरल तरीका है : GDP + उपभोक्ता खर्च + सरकारी खर्च + निवेश + शुद्ध निर्यात। यानि घरेलू खरीदारी, सरकारी व्यय, कंपनियों के निवेश और विदेशी व्यापार से कुल जोड़कर GDP के आंकड़े निकाले जाते हैं।

तिमाही रिलीज़ प्रक्रिया (GDP आंकड़े)
GDP के तिमाही आंकड़े प्रत्येक तिमाही के लगभग दो महीने बाद जारी होते हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल-जून (Q1) के आंकड़े अगस्त में, जुलाई – सितंबर (Q2) के आंकड़े नवंबर में आते हैं।
वार्षिक अनुमान
वर्ष का पहला अस्थाई अनुमान जनवरी में, दूसरा फरवरी में और अंतिम अनुमान मई के अंत तक आता है। हाल ही में fiscal year 2025-26 के Q2 आंकड़े नवंबर 2025 में जारी हुए, जो 8.2% की दर से विकास दिखाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की GDP को दिया ” C ” ग्रेड
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के GDP और राष्ट्रीय लेखांकन के आंकड़े को “C” ग्रेड दिया है। इस ग्रेड का मतलब है कि भारत के आर्थिक आंकड़ों में कुछ कमियां और तकनीकी खामियां है, जिनसे आर्थिक गतिविधियों की सटीक मॉनिटरिंग और सही मूल्यांकन में दिक्कत आती है। इन कमियों के कारण भारत के आर्थिक डेटा की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, जिससे सरकार की नीतियों के उपयोगी एवं सटीक दिशा निर्धारण प्रभावित होती है।
भारत की GDP वृद्धि की बात करें तो, 2025 की तीसरी तिमाही में यह 8.2% रही, जो बाज़ार की अपेक्षाओं से अधिक है। इस वृद्धि के बावजूद IMF और अन्य भारतीय विशेषज्ञ भारत के GDP आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। इनका मानना है कि 8.2% वृद्धि दर के आंकड़े भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था के अनुरूप नहीं दिखते। इस पर कई बार आलोचना हुई है कि सरकारी आंकड़ों में सुधार की आवश्यकता है, खासकर बेरोजगारी, गरीबी और उपभोक्ता खर्च जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतों के संबंध में।

भारत के मुख्य अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार भारत के 8.2% GDP विकास आंकड़े को अविश्वसनीय मानते हैं और इसे हेरफेर वाले बताते हैं। वे कहते हैं कि GDP आंकड़ों में असंगठित (un-organised sector) क्षेत्र को शामिल न करने से वास्तविक विकास दर काफी कम हो जाती है, आधिकारिक आंकड़ों का लगभग आधा।

प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार, दूसरी तिमाही का 8.2% विकास दर RBI के 7% अनुमान से अधिक है। प्रोफेसर कुमार GDP गणना पद्धति पर सवाल खड़ा करते हैं, जिसमें पिछले वर्षों के आंकड़ों में भी बदलाव दिखता है, जो पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि भारत की GDP गणना विश्वसनीय नहीं है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के चिंता जताने को लेकर सही ठहराते हैं। प्रोफेसर कुमार असंगठित क्षेत्र की अनदेखी के कारण विकास दर को 6-7% के आसपास ही मानते हैं, जो आम जनता की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता।

प्रोफेसर कुमार का कहना है कि बढ़ती गरीबी और असामनता के कारण जनता की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है, जो 8.2% विकास दर के आंकड़े से मेल नहीं खाती।
प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि भारत की GDP गणना विश्वसनीय नहीं है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के चिंता जताने को लेकर सही ठहराते हैं। प्रोफेसर कुमार असंगठित क्षेत्र की अनदेखी के कारण विकास दर को 6-7% के आसपास ही मानते हैं, जो आम जनता की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता।
उन्होंने ये भी कहा कि सरकार द्वारा प्रस्तुत GDP विकास दर के पीछे की नीतियों का लाभ ऊपरी वर्ग को जाता है और आम आदमी हाशिए पर है, जिससे आर्थिक विकास का वास्तविक प्रभाव जनता तक नहीं पहुंचता।
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