भारत में अरावली पर्वत माला सबसे प्राचीन श्रृंखलाओं में से एक है, जो लगभग 670-800 किलोमीटर लंबी गुजरात,राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरती है। इसका इतिहास 20-25 करोड़ वर्ष पुराना है और यह हिमालय से भी पुरानी फोल्ड माउंटेन रेंज है। भारत के लिए यह पर्यावरणीय ढाल के रूप में महत्वपूर्ण है, जिसे बचाना जलवायु संतुलन और जैव विविधता के लिए अनिवार्य है।
अरावली का इतिहास
अरावली का निर्माण प्रीकैंब्रियन (precambrian) युग में हुआ, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है और लगभग 670 मिलियन वर्ष पुरानी मानी जाती है। प्राचीन काल में ये ऊंची थी, लेकिन अपक्षय (weathering) से अब इसकी औसत ऊंचाई कम हो गई है, जबकि माउंट आबू का गुरु शिखर 1722 मीटर ऊंचा है। ऐतिहासिक रूप से, इसने राजपूतों को मुगलों से सुरक्षा दी, किले जैसे कुंभलगढ़ और चित्तौड़गढ़ बनाए गए, तथा व्यापार मार्ग के रूप में महत्वपूर्ण रही।
अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में केंद्र की सिफारिश स्वीकार करते हुए अरावली पहाड़ियों को स्थानीय इलाके से 100 मीटर ऊंची भूमि (ढलानों सहित) के रूप में परिभाषित किया। पर्यावरणविदों का आरोप है कि इससे 90% क्षेत्र असुरक्षित हो जाएगा, हालांकि केंद्र ने इसे खारिज किया और कहा कि यह अवैध खनन रोकने के लिए एकरूपता लाएगा। इस परिभाषा से छोटी पहाड़ियों और पारिस्थितिक कनेक्टिविटी को खतरा माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
नवंबर 2025 के फैसले में कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाई, जब तक सस्टेनेबल माइनिंग डेवलेपमेंट प्लान (MPSM) ICFRE द्वारा तैयार न हो। कोर क्षेत्रों में खनन प्रतिबंधित रहेगा, मौजूदा खानों को सख्त पर्यावरण नियमों का पालन करना होगा। दिसंबर 2025 में केंद्र ने राज्यों को पूरे अरावली भू-भ्रंश में नई लीज़ न देने के निर्देश दिए।

100 मीटर नियम से भूजल पर प्रभाव
अरावली की पहाड़ियां भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत हैं, जो वर्षा को भूमिगत जल में बदलती हैं और दिल्ली-एन.सी.आर तथा राजस्थान के सूखे इलाकों को पानी उपलब्ध कराती है। 100 मीटर नियम से 90% निचली पहाड़ियां असुरक्षित हो सकती हैं, जिससे अवैध खनन, वनों की कटाई और निर्माण बढ़ेगा। इससे भूजल स्तर तेजी से गिरेगा, मरुस्थलीकरण बढ़ेगा और गर्मी की लहरें तीव्र होंगी।
भारत सरकार की केंद्र स्तर की समिति ने सुप्रीम कोर्ट में अरावली पर्वतमाला की रिपोर्ट सौंपी, जिसे अदालत ने 20 नवंबर 2025 को स्वीकार किया। यह समिति मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के सचिव की अध्यक्षता में गठित की गई थी।
समिति के सदस्य विभाग
समिति में निम्नलिखित केंद्र एवं राज्य के विभागों/संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल थे:
* पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव (अध्यक्ष)
* वन विभाग के सचिव: दिल्ली (NCT) ,हरियाणा, राजस्थान एवं गुजरात
* फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) का प्रतिनिधि
* सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी (CEC) का प्रतिनिधि
* जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) का प्रतिनिधि

अरावली पहाड़ियां और जैव=विविधता
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और यहां सूखे पर्णपाती वनों तथा समृद्ध जैव-विविधता का भंडार है। इस क्षेत्र में 1000 से अधिक देशी पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जो घासभूमि, झाड़ीभूमि और उष्णकटिबंधीय कांटेदार वनों के रूप में मौजूद हैं।
जीव-जंतु विविधता
यहां तेंदुआ, धारीदार हाइना, जंगली सियार, नीलगाय, सांभर, जंगली सूअर, लंगूर और रीसस मकाक जैसे स्तनधारी प्राणी प्रमुख हैं। सरीसृपों में भारतीय कोबरा, काला करैत, रॉयल रैट स्नेक और रेत की बिच्छू शामिल है, जबकि उभयचरों में सामान्य भारतीय मेंढक पाए जाते हैं। पक्षियों में मोर, ग्रे पैरट्रीज, ब्लैक=ब्रेस्टेड विवर और प्रवासी प्रजातियां जैसे क्रेन और कोयल यहां आम है।
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा 100 मीटर ऊंचाई पर आधारित स्वीकार की है, जिससे 90% से अधिक क्षेत्र खनन के लिए खुल सकता है। इससे जैव=विविधता (bio-diversity) और जंतु=विविधता पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।

जैव विविधता पर प्रभाव
नई परिभाषा से अरावली के जंगलों और पहाड़ियां संकुचित होंगी, जिससे 200 से अधिक पक्षी प्रजातियों और दुर्लभ स्तनधारियों जैसे तेंदुए, सियार, लकड़बग्घे आदि के आवास पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएंगे। मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा और कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं। वन गलियारों का विखंडन जैव-विविधता हॉटस्पॉट को पूरी तरह नष्ट कर देगा।
जंतु-विविधता पर नुकसान
अरावली उभयचरों, सरीसृपों, परागणकर्ताओं और घासभूमि पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन खनन से उनके आवास टूटेंगे। जल स्रोतों का सूखना और वनस्पति विनाश जंतुओं की प्रजनन क्षमता प्रभावित करेगा। पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने से पूरे क्षेत्र में जैविक चक्र बाधित हो जाएगा।
खनन माफिया और राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़
* भारत में खनन माफिया कोई अलग स्वतंत्र ताकत नहीं है, वह अक्सर तीन स्तंभों के गठजोड़ के रूप में काम करता है…
* स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के नेता
* नौकरशाह और पुलिस-प्रशासन
* ठेकेदार, कारोबारी और बिचौलिए
जब ये तीनों मिल जाते हैं तो अवैध खनन को वैधता का कवच मिल जाता है। भारत में खनन माफिया केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों के साथ मिलकर अवैध खनन का जाल बुनते हैं, जिसमें रिश्वतखोरी, लाइसेंसों की अनियमितता और कार्यवाही में नरमी प्रमुख तरीके हैं। यह नेक्सस पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ सरकारी राजस्व की भारी हानि का कारण बनता है। खनन माफिया संगठित गिरोह बनाकर परिवहन, स्टोरेज और बिक्री नियंत्रित करते हैं, जिसमें राजनीतिक संरक्षण मिलता है।
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