बिलासपुर : छत्तीसगढ़ राज्य का बांस गीत एक प्राचीन लोकगीत है, जो मुख्य रूप से राउत या अहीर (यादव) जाती के लोग गाते हैं। यह गीत बांस के वाद्य यंत्र के साथ प्रस्तुत किया जाता है और महाभारत काल से चली आ रही परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
बांस गीत की शुरुआत गाय-भैंस चराने के दौरान हुई, जब राउत समुदाय के युवक जंगलों में बांस से धुन निकालने लगे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाते समय यह वाद्य राउत जाति को प्रदान किया था। यह गीत छत्तीसगढ़ की सादगीपूर्ण संस्कृति का प्रतीक है और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है।

इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में 7 दिसंबर 2025 को पंडित देवकीनंदन दीक्षित ऑडिटोरियम में बांस गीत गाथा अकादमी द्वारा भव्य बांस गीत गाथा सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में 150 से अधिक बांस गायक, वादक और कलाकारों ने एक साथ बांस गीत, वादन और गाथा प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार रिकॉर्ड बनाया। कार्यक्रम दोपहर 2 बजे से रात तक चला, जिसमें वीर लोरिक प्रसंग पर सामूहिक प्रस्तुति और 40 दलों द्वारा विभिन्न ऐतिहासिक प्रसंगों की प्रस्तुतियां हुई।

समारोह के मुख्य अतिथि बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संस्कृति के संरक्षण में मील का पत्थर बताया। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री फूलबासन यादव ने आयोजन की प्रशंसा करते हुए कलाकारों के साथ गर्व व्यक्त किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बिलासपुर नगर पालिक निगम के पूर्व महापौर रामशरण यादव ने अकादमी के 10 वर्षों के निरंतर प्रयासों की सराहना की। अकादमी अध्यक्ष डॉक्टर सोमनाथ यादव ने बांस गीत को विलुप्ति की कगार पर बताते हुए संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
बिलासपुर, जांजगीर, बलौदाबाजार, कवर्धा, बेमेतरा, कोरबा, पेंड्रा और अन्य जिलों के कलाकार शामिल हुए। कार्यक्रम में अभी हाल ही में हुए रावत नृत्य दलों को श्रीफल, शाल और स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में पूर्व महापौर रामशरण यादव, डॉक्टर सोमनाथ यादव, मुंगेली जिले से संतोष यादव, बिलासपुर (तिफरा) से नीरज यादव की विशेष भूमिका रही। इन सभी ने बांस गीत के विलुप्त हो रहे संरक्षण की पुरजोर वकालत की।

पूर्व महापौर रामशरण यादव ने abc newz से बातचीत में कहा कि यह समारोह बांस गीत जैसी पुरातन लोक कला को जीवंत रखने का प्रयास था, जो मुख्यतः यादव समाज द्वारा गाया जाता है। इस तरह के कार्यक्रम छत्तीसगढ़ी संस्कृति को नई ऊंचाई प्रदान करते हैं। ऐसे आयोजनों से लोक परंपराओं का संवर्धन सुनिश्चित होगा।

छत्तीसगढ़ राज्य के बांस गीत में बांस का वाद्ययंत्र शुद्ध बांस की लकड़ी से बनाया जाता है, जिसमें बांस न तो ज्यादा मोटा होता है और न पतला, बल्कि आगे की ओर जरा मुड़ा हुआ बांस चुना जाता है। इसे बाँसकहार या बांस गीत के बजाने वाले व्यक्ति जंगल या गांव के भीरे से चुनकर तैयार करते हैं, जिसमें चार छेद बनाए जाते हैं। इस बांस को मुख्य रूप से अहीर या यादव समाज जाति के लोग स्वयं बनाते हैं, जो बांस गीत गाने वाले पारंपरिक गायक होते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार को बांस गीत के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए, क्यों कि यह रावत / यादव समाज की प्राचीन लोककला विलुप्ति की कगार पर है। सरकार द्वारा आधिकारिक मान्यता, वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर इसका संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को बांस गीत को राज्योत्सव, रंगमहोत्सव के कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से भागीदारी की बात करनी चाहिए। कलाकारों को मासिक भत्ता, उपकरण बनाने में वित्तीय सहायता और सामाजिक संगठनों के माध्यम से कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि बांस गीत के संरक्षण हेतु एक स्पष्ट सांस्कृतिक धरोहर नीति बनाए और इसे राज्य की विरासत घोषित कर इसका संवर्धन और संरक्षण करे।
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