बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक के ग्राम पंचायत परसापानी स्थित मिडिल स्कूल में abc newz की टीम जब जमीनी हक़ीक़त जानने पहुंची तो जो तस्वीर सामने आई उसने स्कूल शिक्षा विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी।
एक तरफ सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर शिक्षा व्यवस्था सुधारने और PM पोषण योजना के माध्यम से बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने का दावा कर रही है , वहीं दूसरी तरफ परसापानी का यह मिडिल स्कूल बदहाली , लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट
abc newz के कैमरे में कैद हुई तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। स्कूल भवन की हालत इतनी जर्जर है कि वर्षों से उसकी रंगाई –पुताई तक नहीं हुई है। कई जगहों पर लोहे की सरिया खुलकर दिखाई दे रही है। किसी भी वक्त स्कूली बच्चे और शिक्षकों के ऊपर छत का टुकड़ा गिर सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर शिक्षा विभाग किस बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है ?
जिस हॉल में बच्चों को पढ़ाई करनी चाहिए , उसी हाल में बच्चों को बैठाकर भोजन कराया जा रहा है। बच्चे ज़मीन पर बैठकर मिड डे मील खाने को मजबूर हैं। स्वच्छता और हाइजीन के मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रहीं हैं।
किचन की भयावह तस्वीर
जब abc newz की टीम PM पोषण योजना के रसोई तक पहुंची तो वहां की स्थिति और भी गंभीर दिखाई दी। रसोई के अंदर चारों तरफ सीलन , गंदगी और बदबू का माहौल था। बर्तन पुराने और क्षतिग्रस्त हालत में मिले।

सवाल यह है कि जिस रसोई में खाना तैयार हो रहा है , वहां स्वच्छता के इतने खराब हालात है तो बच्चों की थाली तक पहुंचने वाले भोजन की गुणवत्ता कैसी होगी ?
क्या शिक्षा विभाग और ज़िम्मेदार अधिकारी कभी इस रसोई का निरीक्षण करने पहुंचे ?
बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
स्कूल की महिला शिक्षिकाओं ने भी स्वीकार किया कि स्कूल में महिला शिक्षकों और छात्राओं के लिए पर्याप्त शौचालय व्यवस्था नहीं है।
आज जब सरकार ” बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ ” और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कर रही है , तब एक सरकारी स्कूल में बच्चियों के लिए मूलभूत सुविधा तक उपलब्ध नहीं होना गंभीर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
खेल सामग्री में भी गड़बड़ी के आरोप
बच्चों ने abc newz को बताया कि उन्हें जो खेल सामग्री उपलब्ध कराई गई है उसकी गुणवत्ता बेहद ख़राब है।
बैडमिंटन रैकेट थोड़ी देर इस्तेमाल में ही टूट रहा है। क्रिकेट बैट बिना उचित ग्रिप के दे दिया गया है। कैरम बोर्ड का आकार इतना छोटा है कि बच्चे ठीक से खेल भी नहीं पाते।

बैडमिंटन रैकेट थोड़ी देर इस्तेमाल में ही टूट रहा है। क्रिकेट बैट बिना उचित ग्रिप के दे दिया गया है। कैरम बोर्ड का आकार इतना छोटा है कि बच्चे ठीक से खेल भी नहीं पाते।
सवाल उठता है कि खेल सामग्री की खरीदी में खर्च किए गए सरकारी धन का उपयोग आखिर कहां हुआ ?
जवाबदेही किसकी ?
यदि स्कूल भवन जर्ज़र है….. यदि किचन बदहाल है….. यदि बच्चों को ज़मीन पर बैठकर भोजन करना पड़ रहा है…. यदि छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है….. यदि खेल सामग्री घटिया है….. तो आखिर ज़िम्मेदार कौन है ? क्या केवल स्कूल के प्राचार्य ? या फिर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ? या ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर (BRC) ? या फिर ज़िले में बैठे ज़िला शिक्षा अधिकारी ?
क्योंकि स्कूलों की नियमित मॉनिटरिंग और निरीक्षण की जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों पर होती है।
परसापानी मिडिल स्कूल की यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं , बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो कागज़ों में विकास और ज़मीनी स्तर पर बदहाली दिखा रही है।
परसापानी ग्राम पंचायत के सरपंच मनीलाल और आदिवासी ग्रामीणों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए , स्कूल भवन का तकनीकी परीक्षण कराया जाए , PM पोषण योजना के संचालन की जांच हो , खेल सामग्री की खरीदी का ऑडिट कराया जाए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाए।
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