बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की कोटा विधानसभा का एक ऐसा मामला, जो आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। ग्राम पंचायत परसापानी और बंगलाभाटा के आदिवासी ग्रामीण आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बरसात के दिनों में ग्राम पंचायत परसापानी के अंतर्गत आने वाले जुनवानी नाला उफान पर रहता है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर मरीजों और गर्भवती महिलाओं तक को जान जोखिम में डालकर नाला पार करना पड़ता है। लेकिन प्रशासन की नींद तब खुली , जब मामला सीधे हाइकोर्ट पहुंच गया।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष निलेश बिस्वास द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के बाद अब हाइकोर्ट ने PWD सचिव (मुकेश बंसल) से व्यक्तिगत शपथ पत्र मांगा है। सवाल यह है कि आखिर 70 वर्षों तक अधिकारी क्या कर रहे थे ?
बिलासपुर जिले की कोटा विधानसभा के अंतर्गत आने वाले परसापानी और बंगलाभाटा गांव विकास की उस हकीकत को सामने लाते हैं , जहां आज भी सड़क और पुल केवल सरकारी फाइलों में दिखाई देते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि आज़ादी के बाद से अब तक यहां “ऑल वैदर रोड” और पुल का निर्माण नहीं हुआ है। बरसात के दिनों में जुनवानी नाला लोगों के लिए मौत का रास्ता बन जाता है।
सबसे गंभीर स्थिति स्कूली बच्चों की है। परसापानी के समीप स्थित मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को रोज़ाना नाला पार करना पड़ता है। बारिश के मौसम में यह नाला खतरनाक रूप ले लेता है। ऐसे में किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। इसके बावजूद कई दशकों तक प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

जब स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई , तब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष निलेश बिस्वास ने हाइकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। जनहित याचिका में आदिवासी ग्रामीणों के आवागमन , बच्चों की सुरक्षा और सड़क , पुल निर्माण की मांग उठाई गई। मामले को गंभीर मानते हुए हाइकोर्ट ने 16 जून 2026 को लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव मुकेश बंसल को व्यक्तिगत शपथ पत्र (personal affidavit) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है !!
* अगर सड़क और पुल की आवश्यकता वर्षों से थी , तो प्रशासन ने पहले कार्यवाही क्यों नहीं की ?
* क्या अधिकारियों को आदिवासी ग्रामीणों की परेशानियां दिखाई नहीं देती थीं ?
* क्या बच्चों की जान खतरे में पड़ने का इंतजार किया जा रहा था ?
* क्या छत्तीसगढ़ में विकास केवल कागज़ों और भाषणों तक सीमित है ?
हाइकोर्ट के बाद प्रशासन की सक्रियता
हाइकोर्ट के सख्ती के बाद प्रशासन अचानक हरकत में आ गया। बंगलाभाटा क्षेत्र में लगभग एक किलोमीटर सड़क निर्माण और बॉक्स कलवर्ट निर्माण के लिए करीब 1 करोड़ 91 लाख रुपए की लागत का टेंडर जारी कर दिया गया है।
निर्माण कार्य की समय–सीमा छह महीने निर्धारित की गई है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बरसात के मौसम में यह निर्माण कार्य किस गति से आगे बढ़ेगा और तय समय में पूरा होगा या नहीं , ये आने वाला समय बताएगा।

नीलेश बिस्वास पर ग्रामीणों का भरोसा
परसापानी और बंगलाभाटा ग्राम पंचायत के आदिवासी ग्रामीणों का कहना है कि कई दशकों से अनदेखी का शिकार रहे इस क्षेत्र की आवाज़ को प्रदेश स्तर तक पहुंचाने में निलेश बिस्वास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लगातार संघर्ष , जनसुनवाई , शिकायतों और अंततः हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने के बाद अब प्रशासनिक तंत्र सक्रिय दिखाई दे रहा है। हालांकि परसापानी का मामला अभी भी न्यायालय में लंबित है और आने वाली सुनवाई में शासन तथा विभागीय अधिकारियों को हाइकोर्ट में अपना पक्ष रखना होगा।
लोक निर्माण विभाग (PWD) अधिकारियों पर सवाल
* जब तक हाइकोर्ट का डंडा नहीं चला , तब तक जिम्मेदार अधिकारी क्यों सोए रहे ?
* अगर कोर्ट में याचिका नहीं लगती तो क्या आज भी ग्रामीण सड़क का इंतजार करते रहते ?
* क्या विभाग के पास इस क्षेत्र की समस्याओं की जानकारी नहीं थी ?
* क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी ?
* क्या केवल टेंडर निकाल देना ही समाधान है या समय पर गुणवत्तापूर्ण निर्माण भी सुनिश्चित किया जाएगा।
हाइकोर्ट ने जवाब मांगा है , अब जनता भी जवाब चाहती है ।
अब सरकार द्वारा सड़क एवं बॉक्स कलवर्ट निर्माण के लिए टेंडर जारी किए जाने के बाद क्षेत्र के लोगों में खुशी का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल सड़क और पुल का निर्माण नहीं बल्कि विकास , शिक्षा , स्वास्थ और रोज़गार के नए रास्ते खोलने वाला कदम है।

” राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष निलेश बिस्वास ने इसे क्षेत्र की जनता की जीत बताते हुए कहा कि वर्षों से उपेक्षित आदिवासी अंचल की आवाज़ को न्यायालय तक पहुंचाने का प्रयास सफल हुआ है। उन्होंने उम्मीद जताई कि निर्माण कार्य जल्द शुरू होकर समय सीमा में पूरा होगा। बिस्वास कहते हैं , यह किसी व्यक्ति की नहीं , बल्कि परसा पानी और बंगलाभाटा पंचायतों के हज़ारों आदिवासी ग्रामीणों की जीत है। सड़क और पुल बनने से आदिवासी क्षेत्र विकास की मुखधारा से जुड़ेगा ”
परसापानी और बंगलाभाटा (कोटा विधानसभा) की कहानी केवल दो गांवों की कहानी नहीं है , बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो अक्सर तब जागती है जब अदालत हस्तक्षेप करती है।
फिलहाल हाइकोर्ट की अगली सुनवाई का इंतज़ार है। देखना होगा कि PWD सचिव मुकेश बंसल और विभागीय अधिकारी हाइकोर्ट में क्या जवाब देते हैं और आदिवासी ग्रामीणों को उनका अधिकार कब तक मिलता है।
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