बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर और जिले में बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमराती नज़र आ रही है। हल्की आंधी, थोड़ी बारिश या सामान्य गर्मी…. और पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता है। तोरवा , मंगला , नेहरू नगर , चिल्हाटी , तखतपुर , मल्हार , पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग , कलेक्टोरेट बिल्डिंग , ज़िला पंचायत क्षेत्र…. शायद ही कोई इलाका बचा हो जहां लोग बिजली संकट से परेशान न हों।
बिलासपुर कॉन्ग्रेस पार्टी ने दो दिन पहले तिफरा क्षेत्र में बिजली विभाग के ऑफिस का घेराव किया था। घेराव के दौरान नेताओं के दबाव के मद्देनजर विभाग के executive director A.K.Ambasht ने असिस्टेंट इंजीनियर और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर्स की बैठक ली। अधिकारियों को फॉल्ट कम करने , ट्रिपिंग रोकने और मेंटेनेंस सुधारने के निर्देश दिए गए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही ?
लोड बढ़ गया या प्लैनिंग फेल हुई ?
बिजली विभाग का वही पुराना तर्क है कि गर्मी में लोड बढ़ गया है। AC , cooler , fridge और नए कनेक्शनों की वजह से दबाव बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि…. अगर हर साल गर्मी आती है, हर साल लोड बढ़ता है, तो विभाग पहले से तैयारी क्यों नहीं करता ? क्या ट्रांसफॉर्मर क्षमता बढ़ाई गई ? क्या पुराने केबल बदले गए ? क्या नए सब–स्टेशन समय पर बने ? क्या फीडरों का अपग्रेडेशन हुआ ? अगर नहीं हुआ , तो यह सीधी प्रशासनिक लापरवाही नहीं तो और क्या है ?
घटिया केबल और ट्रांसफॉर्मर पर सवाल
ED ambasht खुद पत्रकारों से कह रहे हैं कि केबल बर्निंग की समस्या लगातार आ रही है। अब सवाल उठ रहा है कि…. क्या शहर और आसपास के इलाकों में घटिया क्वालिटी की केबल लगाई गई ? क्या ट्रांसफार्मर की खरीदी और इंस्टॉलेशन में भ्रष्टाचार हुआ ? क्या मेंटेनेंस सिर्फ कागज़ों में होता रहा ?
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का सीधा आरोप है कि, कई क्षेत्रों में बिजली कई घंटे और कई दिनों से बिजली गुल रहती है, वर्षों पुराने जंग लगे ट्रांसफॉर्मर चल रहे हैं, मेंटेनेंस के नाम पर करोड़ों रुपए स्वीकृत किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर व्यवस्था बद से बदतर है, हल्की बारिश या हवा में भी विभाग की पोल खुल जाती है।

मुख्यमंत्री के विभाग में इतनी अव्यवस्था क्यों ?
ऊर्जा विभाग सीधे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के अधीन है। ऐसे में सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही उठ रहा है कि…. अगर विभाग मुख्यमंत्री के पास है तो जवाबदेही किसकी तय होगी ? क्या मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी हालात की मॉनिटरिंग कर रहे हैं ? क्या प्रमुख सचिव सुबोध सिंह ने कभी बिलासपुर की ज़मीनी स्थिति की समीक्षा की ? CSPDCL के MD आखिर क्या कर रहे हैं ? क्या विभागीय अधिकारी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की छवि खराब करने में लगे हुए हैं ? क्या सरकार तक सही जानकारी पहुंच ही नहीं रही है ?
मुख्यमंत्री सचिवालय में ऊर्जा विभाग से जुड़े कई अधिकारी कार्यरत हैं , जिनकी जिम्मेदारी राज्य की बिजली व्यवस्था की निगरानी करना , विभागीय समन्वय बनाना , योजनाओं की मॉनिटरिंग करना और जनता की शिकायतों का समाधान सुनिश्चित करना है। इन अधिकारियों में प्रमुख सचिव , सचिव , विशेष सचिव और ऊर्जा विभाग के तकनीकी स्तर के अधिकारी शामिल रहते हैं। इनका कार्य बिजली उत्पादन , वितरण, ट्रांसमिशन और उपभोक्ता सेवाओं की समीक्षा करना होता है। लेकिन सवाल यह है कि जब प्रदेशभर से शिकायतें आ रहीं हैं, तब आखिर सचिवालय स्तर पर मॉनिटरिंग कैसे की जा रही है ?
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड यानी CSPDCL के प्रबंधन पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कंपनी के प्रबंध निदेशक यानी MD की जिम्मेदारी पूरे प्रदेश में सुचारू बिजली वितरण सुनिश्चित करना , फील्ड अधिकारियों की जवाबदेही तय करना और उपभोक्ताओं की समस्याओं का समाधान करना होता है। लेकिन बिलासपुर की स्थिति देखकर जनता पूछ रही है कि आखिर अधिकारी AC दफ्तरों में बैठकर कर क्या रहे हैं ?
बिलासपुर शहर की तमाम शासकीय बिल्डिंग में बिजली संकट का असर साफ दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि कई दफ्तरों में सुबह से शाम तक बिजली गुल रही , जिससे सरकारी कामकाज पूरी तरह प्रभावित रहा। कई जगह अधिकारी और कर्मचारी भी नदारद मिले। जनता का आरोप है कि जब सरकारी दफ्तरों का यह हाल है, तो आम नागरिकों की परेशानी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

बिलासपुर में बिजली संकट अब सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं रह गया है , यह प्रशासनिक जवाबदेही, सिस्टम की तैयारी और कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अगर समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी, तो किसी दिन बहुत बड़ा हादसा भी हो सकता है।
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