छत्तीसगढ़ के बिलासपुर तहसील कार्यालय में सीमांकन , नामांतरण , नक्शा दुरुस्ती , बंटवारा और अन्य राजस्व मामलों के लंबित रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
हाइकोर्ट कई मामलों में राजस्व अधिकारियों को समय–सीमा के भीतर कार्यवाही करने के निर्देश दे चुका है। कई बार अधिकारियों से जवाब मांगा गया , हलफनामे (affidavit) प्रस्तुत किए गए और प्रशासन को लंबित मामलों के निराकरण के निर्देश दिए गए।
लेकिन बड़ा सवाल यह है–
अगर हाइकोर्ट के आदेश के बाद भी राजस्व मामलों का समय पर निराकरण नहीं होता , तो जिम्मेदारी किसकी है ? क्या केवल तहसीलदार जिम्मेदार है ? क्या SDM की भी जवाबदेही बनती है ? क्या अतिरिक्त कलेक्टर को जवाब देना होगा ? और जिले के राजस्व प्रशासन प्रमुख के रूप में क्या कलेक्टर की भी जिम्मेदारी तय की जा सकती है ?

आखिर हाइकोर्ट के पास ऐसे अधिकारियों के खिलाफ क्या कानूनी प्रक्रिया है ? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 215 हाइकोर्ट को ” कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड ” का दर्ज़ा देता है और उसे अपने न्यायालय की अवमानना के मामलों में कार्यवाही तथा दंड देने की शक्ति प्रदान करता है।
यदि किसी अधिकारी द्वारा हाइकोर्ट के स्पष्ट आदेश का जानबूझकर पालन नहीं किया जाता , तो मामला न्यायालय की अवमानना के दायरे में आ सकता है।
अब सवाल है–
क्या बिलासपुर के राजस्व अधिकारियों के मामले में हाइकोर्ट द्वारा केवल बार–बार निर्देश देना पर्याप्त है ?
यदि कई वर्षों से एक जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं और नागरिकों को सामान्य राजस्व कार्यों के लिए बार–बार हाइकोर्ट तक जाना पड़ रहा है , तो क्या केवल अधिकारियों द्वारा हलफनामा देने से समस्या समाप्त हो जाएगी ? क्या हर बार अधिकारी यह कहकर बच सकते हैं कि जल्द कार्यवाही की जाएगी ?

और यदि हलफनामे में समय –सीमा दी जाती है , लेकिन उसके बाद भी अधिकारी काम पूरा नहीं करते , तो क्या उस हलफनामे की सत्यता और जवाबदेही की जांच नहीं होनी चाहिए ?
abc newz का सवाल है–
* क्या हाइकोर्ट को अब केवल फटकार से आगे बढ़कर लंबित मामलों की जवाबदेही तय करनी चाहिए ?
* क्या तहसीलदार से लंबित मामलों की सूची मांगी जानी चाहिए ?
* क्या यह तय होना चाहिए कि कौन से फाइल किस अधिकारी के पास और कितने समय से लंबित है ?
* क्या तहसीलदार से व्यक्तिगत जवाब लिया जाना चाहिए ?
* क्या SDM/SDO से पूछा जाना चाहिए कि अधीनस्थ न्यायालयों और प्रशासनिक कार्यों की निगरानी क्यों नहीं हुई ?
* क्या कलेक्टर और अतिरिक्त कलेक्टर स्तर पर लंबित मामलों की समीक्षा की जानी चाहिए ?
वैसे तो पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में तहसील कार्यालयों में कई हज़ार मामले काफी लंबे समय से पेंडिंग हैं , राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर की हालत सबसे खराब बताई जाती है । समय–समय पर कलेक्टर राजस्व मामलों की समीक्षा करते हैं , लेकिन आज तक कोई ठोस परिणाम निकल नहीं पाया है। उल्टे दिन–ब–दिन स्थिति बहुत गंभीर होते जा रही है। राजस्व अधिकारियों द्वारा आम जनता को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है।
राजस्व अधिकारियों के ऊपर हाइकोर्ट की फटकार का भी कोई असर दिखता नहीं है। हाइकोर्ट के पास यह शक्ति है कि वह मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार या सक्षम विभाग से कार्यवाही पर जवाब मांगे , जांच की स्थिति तलब करे और कानून के अनुसार उचित निर्देश जारी करे।
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि तहसील कार्यालय में सीमांकन हो , नामांतरण हो , त्रुटि सुधार हो या अन्य मामले हों , अधिकारियों द्वारा जानबूझकर मामलों को कई साल और महीने पेंडिंग रखे जाते हैं। अधिकारियों के इस करतूत से आम जनता में काफी रोष देखने को मिल रहा है। अगर इन मामलों को जल्दी नहीं सुलझाया जाता है तो , कभी भी इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
अब जनता पूछ रही है–
जब सीमांकन , नामांतरण , नक्शा सुधार या अन्य मामलों के लिए निर्धारित प्रक्रिया और समय–सीमा है , तो आम नागरिकों को महीनों तक कार्यालयों के चक्कर क्यों लगवाए जा रहे हैं। जब हाइकोर्ट लगातार निर्देश दे रहा है , तो व्यवस्था में सुधार रत्ती भर का भी क्यों नहीं दिख रहा है ? ऐसा लगता है कि राजस्व अधिकारी लगातार हाइकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं। बार–बार जवाब प्रस्तुत करना , और personal affidavit देना राजस्व अधिकारियों का लगता है फैशन बन गया है।
बिलासपुर तहसील कार्यालय की बात की जाए तो यहां लंबित मामलों को लेकर सवाल लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। सीमांकन हो , बंटवारा हो , त्रुटि सुधार हो या राजस्व रिकॉर्ड में सुधार , आम नागरिकों को महीनों और कई बार वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि इन मामलों को लेकर नागरिकों को बार–बार हाइकोर्ट तक जाना पड़ रहा है , और हाइकोर्ट के निर्देश के बावजूद अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई भी सुधार देखने को नहीं मिल रहा है।
राजस्व मामलों में देरी का सीधा असर आम आदमी की संपत्ति और उसके आर्थिक हितों पर पड़ता है। राजस्व न्याय में देरी केवल प्रशासनिक देरी नहीं , बल्कि कई मामलों में यह नागरिक के अधिकार को प्रभावित करने वाली देरी है।
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