बिलासपुर : (छत्तीसगढ़) आज हम आपसे बात करेंगे एक ऐसे कानून की जिसने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने की ताकत दी, “सूचना का अधिकार” यानी RTI
भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लागू होने से पहले सरकारी कामकाज में पारदर्शिता की भारी कमी थी। आम जनता के लिए ये जानना लगभग नामुमकिन था कि सरकारी फैसले कैसे लिए जा रहे हैं, और जनता के पैसों का इस्तेमाल कहां हो रहा है। इसी कमी को दूर करने के लिए 2005 में RTI कानून लाया गया। इस कानून का उद्देश्य साफ है कि सरकारी कामकाज को जनता के सामने खुला और जवाबदेह बनाना है, हर नागरिक को यह अधिकार देना कि वह सरकार से जानकारी मांग सके।
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ राज्य में ज्यादातर विभाग इस कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। अभी हाल ही में एक संगीन मामला हमारे सामने आया। मामला छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग के CCF और DFO रैंक के अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता गणेश जैन ( गौरेला, पेंड्रा, मरवाही ) ने 15.11.2021 को गरियाबंद DFO कार्यालय में RTI act के तहत आवेदन दिया था। आवेदन में उन्होंने वनपरिक्षेत्र में पदस्थ रेंजर से संबंधित आय–व्यय पुस्तिका से संबंधित जानकारी मांगी, साथ ही आवेदक ने वर्ष 2021 के माह मार्च, जून, सितंबर और अक्टूबर में CAMPA मद से कराए गए कार्यों के प्रमाणक ( voucher ) की भी जानकारी मांगी। DFO गरियाबंद मयंक अग्रवाल के कार्यालय से किस प्रकार भ्रामक जानकारी आवेदक गणेश जैन को दी गई, हम आपको सिलसिलेवार बताते हैं।
जनसूचना अधिकारी DFO मयंक अग्रवाल द्वारा दिनांक 14.12.2021 को आवेदक को उत्तर दिया गया कि, चाही गई जानकारी में भुगतान प्राप्तकर्ता का नाम तथा खाता क्रमांक आदि व्यक्तिगत जानकारी होने से उत्तर देना निषेधित है। पत्र में आगे उत्तर दिया गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 11 के तहत थर्ड पार्टी की जानकारी होने से अधिनियम की धारा 8 (1) ( j ) के तहत जानकारी नहीं दी जा सकती। DFO गरियाबंद मयंक अग्रवाल के उत्तर से ये समझ में साफ आ जाता है कि CAMPA मद से जो भी कार्य उनके परिक्षेत्र में कराए गए हैं, उनकी जानकारी इनके हिसाब से थर्ड पर्सन जानकारी की श्रेणी में आती है, जबकि ज्यादातर CAMPA मद के कार्यों का टेंडर किया जाता है , जो पूरी तरह से पब्लिक डॉक्यूमेंट की श्रेणी में आता है। इसका मतलब साफ है कि मयंक अग्रवाल RTI act की खुले आम बेखौफ होकर धज्जियां उड़ा रहे हैं।
DFO गरियाबंद मयंक अग्रवाल के गलत और भ्रामक जवाब के खिलाफ शिकायकर्ता गणेश जैन ने 8.01.2022 को रायपुर सर्किल के CCF जे. आर. नायक के कार्यालय में प्रथम अपील आवेदन प्रस्तुत किया। सुनवाई के पश्चात प्रथम अपीलीय अधिकारी ( J.R.NAYAK ) ने 16.02.2022 को जवाब दिया कि DFO गरियाबंद मयंक अग्रवाल के कार्यालय से दी गई जानकारी को मान्य किया जाता है और प्रकरण को नस्तीबद्ध कर दिया गया।
आप छत्तीसगढ़ के वन विभाग में बैठे बड़े अधिकारियों की RTI act के प्रति जवाबदेही की स्थिति देखिए। जो कार्य पूरी तरह से टेंडर से संबंधित है, उसका भी डिटेल वाउचर देने में आवेदक को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। हम आगे इस एपिसोड में आपको बताएंगे कि CAMPA मद के अंतर्गत वन विभाग किन–किन कार्यों को करवाता है।
आवेदक गणेश जैन ने CCF जे. आर. नायक और DFO मयंक अग्रवाल के खिलाफ दिनांक 6.02.2023 को राज्य सूचना आयोग से शिकायत की और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही का निवेदन किया गया। राज्य सूचना आयोग ने दिनांक 22.12.2023 को DFO और CCF कार्यालय को पत्र प्रेषित कर कार्यवाही की संपूर्ण जानकारी मांगी गई। आयोग के पत्र के जवाब में DFO मणिवासन एस ने तत्कालीन DFO मयंक अग्रवाल को पत्र प्रेषित कर सूचना आयोग को जानकारी दी गई, उस वक्त मयंक अग्रवाल की पोस्टिंग बलौदाबाजार में की गई थी।
दिनांक 29.01.2025 और 10.06.2025 को DFO और CCF को शिकायतकर्ता के आवेदन का सही निराकरण नहीं किए जाने के कारण सूचना आयोग द्वारा धारा 20(1) एवं 20(2) का नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया। सूचना आयोग की नोटिस के बावजूद आवेदक गणेश जैन को प्रथम अपीलीय अधिकारी (CCF) ने कोई भी जानकारी नहीं दी। मतलब वन विभाग के CCF रैंक के अधिकारी का हाल ये है कि इनको लगता है कि CAMPA मद में जो भी कार्य करवाए जा रहे है, इनकी प्राइवेट प्रॉपर्टी है।
एक और महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहते हैं, ( लोक प्राधिकारी ) सचिव, छत्तीसगढ़ शासन वन विभाग द्वारा पत्र क्रमांक 82 दिनांक 17.03.2020 के द्वारा निर्देशित किया गया था कि व्यक्तिगत जानकारी जैसे कि बैंक अकाउंट, आधार नंबर आदि उसमें दर्ज है तो उस स्थिति में उसे छुपाकर दिया जाना है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 10 (1) में छिपाकर शेष जानकारियां देने का प्रावधान है। बावजूद इसके CCF और DFO अपने ही विभाग के सर्कुलर को डस्टबिन में डाल दिए हैं।
राज्य सूचना आयोग के नोटिस देने के बावजूद जवाब नहीं देने के मामले में आयोग ने अपने आदेश में कहा कि तत्कालीन जन सूचना अधिकारी मयंक अग्रवाल द्वारा उनके विभागीय सचिव के निर्देश एवं अधिनियम का स्पष्ट उल्लेख सूचना पत्र में किए जाने के बावजूद उनके द्वारा अपने बचाव एवं पक्ष समर्थन में दिए गए जवाब दिनांक 2.07.2025 समाधान पूर्वक नहीं है।
सूचना आयोग ने DFO मयंक अग्रवाल को दिनांक 10.06.2025 को अंतिम नोटिस देकर दंडित किए जाने का निर्णय लिया। आयोग ने कहा कि DFO मयंक अग्रवाल के मामले में सूचना देने में कुल 1351 दिन का विलंब किया गया। विलंब के कुल दिन 1351*250 = 337750₹ होते है, लेकिन धारा 20(1) के तहत सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आयोग को अधिकतम 25000 ₹ शास्ति अधिरोपित किए जाने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए DFO मयंक अग्रवाल पर 25000 ₹ का जुर्माना लगाया गया।
दूसरी तरफ प्रथम अपीलीय अधिकारी CCF जे. आर. नायक के मामले में भी राज्य सूचना आयोग ने गंभीर टिप्पणी की हैं। आयोग ने कहा है कि CCF ने आयोग के पत्र का कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया है। स्पष्ट है कि CCF सूचना के अधिकार अधिनियम एवं राज्य शासन द्वारा जारी निर्देशों के बावजूद अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में असफल रहे हैं, जिसके कारण अपीलार्थी, अधिनियम के तहत प्राप्त अधिकारों अनुसार समयसीमा में जानकारी प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ शासन सामान्य प्रशासन विभाग के पत्र दिनांक 14.11.2013 की कंडिका 9 एवं 29.04.2013 की कंडिका 2 के अनुसार विधि सम्मत जिम्मेदारी एवं कर्तव्यों का पालन न किए जाने के लिए शासन के उपरोक्त निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में संबंधित अधिकारी (CCF) दोषी है।
आपको बता दें कि शिकायतकर्ता गणेश जैन के मामले में एक, दो, तीन नहीं 9 शिकायतें हैं वन विभाग के बड़े अधिकारियों के खिलाफ। जैन काफी समय से इन अधिकारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने में लगे हुए हैं। ये अधिकारी न तो खुद अपने विभाग के सर्कुलर को तवज्जो दे रहे है और न ही राज्य सूचना आयोग के आदेशों का पालन कर रहे हैं। ये अधिकारी राज्य सूचना आयोग के आदेशों के खिलाफ फिलहाल बिलासपुर हाइकोर्ट की शरण में हैं।
छत्तीसगढ़ में वन विभाग के अंतर्गत compensatory afforestation fund management and planning authority का उपयोग उन कार्यों के लिए किया जाता है जो वन क्षति की भरपाई और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े होते हैं। प्रमुख कार्यों में पौधारोपण, पौधों की देखभाल, मिश्रित प्रजातियों का पौधारोपण, सिविल कार्य जैसे स्टॉप डैम, चैक डैम, नालों का उपचार, वन्यजीव कॉरिडोर विकास,नर्सरी विकास आदि कार्य इसके तहत करवाए जाते हैं। ज्यादातर कार्यों में टेंडर की प्रक्रिया के तहत कार्य होते हैं।
अब देखना ये है कि वन विभाग के अधिकारियों की सुनवाई के मामले में हाइकोर्ट इन अधिकारियों के ऊपर क्या कार्यवाही करता है। उम्मीद है कि हाइकोर्ट इन अधिकारियों के ऊपर सख्त कार्यवाही करेगा।
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