बिलासपुर : (छत्तीसगढ़) बिलासपुर में सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच का फ़र्क अगर देखना हो , तो कलेक्टर कार्यालय से महज़ वॉकिंग डिस्टैंस पर स्थित पुरानी और जर्ज़र कंपोजिट बिल्डिंग पहुंच जाइए। यहीं से करीब 11 महत्वपूर्ण सरकारी विभाग संचालित हो रहे हैं। लेकिन बरसात की पहली तेज़ बौछार ने ही इस इमारत की हालत की पोल खोलकर रख दी है।

सबसे चिंताजनक स्थिति पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग यानी PHE विभाग की बताई जा रही है। कर्मचारियों के अनुसार छत से लगातार पानी टपक रहा है , सीलिंग जगह–जगह से क्षतिग्रस्त है और बरसात का पानी सीधे कार्यालय के भीतर आ रहा है। इससे महत्वपूर्ण सरकारी फाइलें और रिकॉर्ड खराब होने का खतरा पैदा हो गया है। PHE विभाग में लगभग 35 कर्मचारी प्रतिदिन इसी माहौल में काम करने को मजबूर हैं।

नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कर्मचारियों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है , लेकिन स्थाई समाधान आज तक नहीं किया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कलेक्टर कार्यालय और नई कंपोजिट बिल्डिंग की व्यवस्थाएं बेहतर है , तब उसी परिसर के पास स्थित इस पुरानी इमारत को आखिर क्यों उसके हाल पर छोड़ दिया गया ?
पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। छत पर लगी एस्बेस्टस शीत पूरी तरह ख़राब हो चुकी है। बरसात के दिनों में कई कार्यालयों की छत से पानी टपकता है , जिससे सरकारी रिकॉर्ड्स और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ ख़राब हो रहे हैं। बाथरूम बदहाल है , कॉरिडोर में गंदगी और बदबू फैली रहती है , जबकि बिजली की लगातार कटौती के कारण कर्मचारियों और आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

abc newz ने जब PWD बिलासपुर डिवीजन–1 के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि भवन की मरम्मत , छत बदलने , पेंटिंग और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए लगभग 68 लाख रुपयों का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है। अधिकारियों के अनुसार पिछले तीन वर्षों से बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय के माध्यम से लगातार पत्राचार किया जा रहा है , लेकिन अब तक राशि स्वीकृत नहीं हुई है।
पिछले तीन वर्षों में बिलासपुर जिले में सौरभ कुमार , संजीव कुमार झा , अवनीश कुमार शरण और वर्तमान में संजय अग्रवाल जैसे कलेक्टर पदस्थ रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लगातार पत्राचार के बावजूद पुरानी कंपोजिट बिल्डिंग की मरम्मत का समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पाया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जिले में हर वर्ष DMF और विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों की CSR राशि राशि से करोड़ों रुपए के विकास कार्य स्वीकृत होते हैं , वहां मात्र 68 लाख रुपए के अभाव में 11 महत्वपूर्ण सरकारी विभागों को जर्ज़र भवन में क्यों संचालित किया जा रहा है ? यदि वैधानिक प्रावधानों के तहत DMF या CSR फंड का उपयोग संभव था , तो क्या इस विकल्प पर गंभीरता से विचार किया गया ? यदि नहीं , तो इसके लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी ?
ऐसी स्थिति में जिला कलेक्टर संजय अग्रवाल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। कलेक्टर जिले के समन्वयकारी अधिकारी होने के नाते संबंधित विभागों की संयुक्त बैठक बुलाकर कंपोजिट बिल्डिंग की वास्तविक स्थिति की तत्काल समीक्षा कर सकते हैं। यदि बिल्डिंग असुरक्षित पाई जाती है तो प्राथमिकता के आधार पर आवश्यक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करना , संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित करना तथा शासन के समक्ष तत्काल वित्तीय स्वीकृति के लिए प्रभावी पहल करना प्रशासनिक दायित्व का हिस्सा है।

सवाल यह भी है कि यदि तीन साल से मात्र 68 लाख रुपए का प्रस्ताव लंबित है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है ? फाइल किस स्तर पर रुकी हुई है ? इसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि जिम्मेदारी तय हो सके और समाधान में अनावश्यक देरी समाप्त हो।
सरकारी कार्यालयों का उद्देश्य जनता को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में सेवाएं देना है। यदि कर्मचारी स्वयं असुरक्षित बिल्डिंग में काम करने को मजबूर हों , सरकारी रिकॉर्ड्स बारिश में भीग रहे हों और आम जनता बदहाल शौचालय व अंधेरे गलियारों से गुजरने को विवश हों , तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

अब समय केवल पत्राचार का नहीं , बल्कि ज़मीन पर कार्यवाही का है। बिलासपुर की जनता और मेहनतकश सरकारी कर्मचारी यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस जर्ज़र कंपोजिट बिल्डिंग को सुरक्षित बनाने की शुरुआत कब होगी।
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