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बिलासपुर : छत्तीसगढ़ में बिजली व्यवस्था को लेकर जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। बिलासपुर , रायपुर , और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले कई महीनों से लगातार बिजली कटौती की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थिति यह है कि हल्की बारिश , मामूली आंधी या बिजली चमकने के बाद भी घंटों तक बिजली आपूर्ति बाधित हो जाती है। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी , जबकि हर साल मॉनसून आने से पहले तैयारियां की जानी चाहिए थी।
हाल ही में बिजली कंपनी के चैयरमैन सुबोध कुमार सिंह (IAS) ने समीक्षा बैठक में अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। बताया गया कि सबसे अधिक शिकायतें बिलासपुर से मिल रही है। इसके बाद सुबोध कुमार सिंह के निर्देश में बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए 10 करोड़ रुपए तत्काल जारी किए गए।। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि समस्या पहले से मौजूद थी , तो समीक्षा बैठक और अतिरिक्त बजट का फैसला तब क्यों नहीं लिया गया , जब मॉनसून शुरू होने से पहले तैयारी की जा सकती थी ?

बिलासपुर में लगातार ट्रांसफार्मर के उपकरण खराब होने , फ्यूज़ उड़ने , केबल जलने , ट्रांसफार्मर ब्लास्ट होने और पेड़ों के बिजली लाइनों पर गिरने जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रहीं हैं। यदि पेड़ों की नियमित छटाई नहीं हुई , तो केवल यह बिजली विभाग का ही नहीं , बल्कि नगर निगम और संबंधित वन विभाग के बीच समन्वय की कमी का भी विषय बनता है। इस तरह की लापरवाही का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।
स्थानीय अधिकारियों की ओर से यह भी कहा गया है कि बिलासपुर क्षेत्र में स्टाफ की लगभग 25% की कमी है और बड़ी संख्या में ठेका कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं। इसका मतलब बिलासपुर में इस वक्त बिजली विभाग सिर्फ आधे कर्मचारियों से ही काम करवा पा रहा है। बिजली विभाग के चेयरमैन सुबोध कुमार सिंह को इस गंभीर समस्या का हल जल्द से जल्द निबटाना चाहिए । यदि आवश्यक मानव संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे और कर्मचारियों की समस्या का समय पर समाधान नहीं होगा , तो इमरजेंसी मरम्मत कार्य भी प्रभावित होंगे। यह प्रशासनिक योजना और प्रबंधन के गंभीर फेल्योर को दर्शाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। यदि हर साल मॉनसून के दौरान यही संकट दोहराया जाता है , तो क्या केवल समीक्षा बैठक और फटकार पर्याप्त है ? क्या अधिकारियों की कार्यप्रणाली का स्वतंत्र ऑडिट होगा ? क्या यह जांच होगी कि रखरखाव , लाइन मेंटेनेंस , पेड़ों की कटाई – छटाई , उपकरणों की खरीद और पर्याप्त स्टाफ की उपलब्धता में कहीं प्रशासनिक लापरवाही या वित्तीय अनियमितता तो नहीं हुई है ?
बिजली व्यवस्था केवल समीक्षा बैठकों से नहीं चलती। हर वर्ष गर्मी शुरू होने से पहले लोड बढ़ने का अनुमान लगाया जाता है। बरसात से पहले जर्ज़र लाइनों की मरम्मत , पेड़ों की कटाई–छटाई , ट्रांसफार्मरों की जांच , फीडरों का रखरखाव और आपदा प्रबंधन की तैयारी की जाती है। यदि इन तैयारियों में कमी रही , तो उसकी जवाबदेही केवल स्थानीय अधिकारियों तक सीमित नहीं हो सकती।

सवाल मुख्यमंत्री सचिवालय और ऊर्जा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी उठते हैं। यदि बिलासपुर से सबसे अधिक शिकायतें लगातार आ रहीं थीं , तो क्या उच्च स्तर पर समय रहते समीक्षा और सुधारात्मक कार्यवाही की गई ? क्या आवश्यक बजट , स्टाफ और संसाधन उपलब्ध कराए गए ?
जनता का सवाल सीधा है – जब हर साल गर्मी और बरसात निश्चित है , तो हर साल बिजली व्यवस्था संकट में क्यों आ जाती है ? क्या ऊर्जा विभाग केवल संकट आने के बाद समीक्षा बैठकें करेगा , या भविष्य में पहले से योजना बनाकर ऐसी स्थिति रोकने का प्रयास करेगा ?

बिजली जैसी मूलभूत सेवा में जवाबदेही हर स्तर पर तय होनी चाहिए। यदि कहीं स्टाफ की कमी है , उपकरण पुराने हैं या प्रशासनिक निर्णयों में देरी हुई है , तो उन कारणों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और ज़िम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। क्योंकि जनता को फटकार नहीं , निर्बाध बिजली चाहिए।
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