छत्तीसगढ़ की पहचान उसके घने जंगलों और समृद्ध वन्यजीवों से है । लेकिन अब यही जंगल बाघों के लिए सुरक्षित नहीं रह गए हैं। इंद्रावती टाइगर रिज़र्व (बीजापुर जिला , इंद्रावती नदी के नाम से नामकरण) में बाघों की कथित पोचिंग (अवैध शिकार) और वन्यजीव तस्करी का मामला अब विधानसभा तक पहुंच चुका है। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत , पामगढ़ की कांग्रेस विधायक श्रीमती शेषराज हरबंस और बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (calling attention motion) के जरिए सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं।

विधानसभा में उठाए गए मुद्दे के अनुसार , बस्तर में नक्सली गतिविधियां कम होने के बाद अब वन्यजीव तस्करों की सक्रियता बढ़ने का आरोप लगाया गया। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में कहा गया है कि इंद्रावती टाइगर रिज़र्व से जुड़े मामलों में पहले 3 बाघों और बाद में 2 अन्य बाघों की खाल बरामद होने के मामले सामने आए। वन विभाग की संयुक्त कार्यवाही में कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई , जिनमें महाराष्ट्र पुलिस के कर्मियों के शामिल होने का आरोप लगाया गया।
विपक्ष ने यह भी कहा कि 13 मई 2026 को wildlife crime control bureau ने राज्य के वन मुख्यालय को संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने और विशेष सतर्कता बरतने की चेतावनी दी थी। आरोप है कि इसके बावजूद पर्याप्त एहतियाती कार्यवाही नहीं की गई और बाघों के अवैध शिकार की घटनाएं सामने आती रहीं।

नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत , पामगढ़ विधायक शेषराज हरबंस और बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने विधानसभा में यह भी सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार हर वर्ष बाघ संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च करती है , तब भी यदि बार–बार अवैध शिकार हो रहे हैं तो निगरानी व्यवस्था में कमी कहां है ? विपक्ष ने विभागीय जवाबदेही तय करने और दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की।
विपक्ष के तीखे और सटीक सवालों के जवाब में वन मंत्री केदार कश्यप ने विधानसभा में बताया कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच बाघों के शिकार और तस्करी के 5 प्रकरण सामने आए। दिनांक 29.06.2026 को मुखबिर से सूचना मिलने के उपरांत anti poaching टीम संयुक्त रूप से कार्यवाही करते हुए बांदे पखांजूर मार्ग पर दो संदिग्धों को रोका गया तथा तलाशी ली गई, जिनके पास से बाघ की 2 खालें , 13 मूछें एवं एक मोटरसाइकिल जब्त की गई। पूछताछ में दोनों आरोपियों ने अपने आप को महाराष्ट पुलिस विभाग से संबद्ध होना बताया। महाराष्ट्र पुलिस के इंटेलीजेंस सेल में पदस्थ दोनों आरोपियों को भानुप्रतापपुर न्यायालय में पेश किया गया और जेल दाखिल कराया गया। पकड़े गए तस्करों से कड़ाई से पूछताछ के आधार पर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर इंद्रावती नदी के किनारे स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के नेतीवाड़ा गांव में एक व्यापक और सघन सर्च ऑपरेशन चलाया गया। वन विभाग के अमले ने गांव में प्रत्येक संदिग्ध घर की तलाशी ली। इस तलाशी अभियान के दौरान आरोपियों के घरों से शिकार में इस्तेमाल होने वाले फंदे , चाकू , 12 नाखून और 4 कैनाइन दांत बरामद किए गए। इसी अभियान के तहत इंद्रावती नदी के किनारे छुपाकर रखी गई एक तीसरी बाघ की खाल भी जब्त कर ली गई। इस मामले में वन विभाग ने और भी गिरफ्तारियां की हैं। इस प्रकरण में उप वन क्षेत्रपाल , वनरक्षक, परिक्षेत्र अधिकारी को निलंबित किया गया है।

लेकिन यहीं से कई गंभीर सवाल उठते हैं….
यदि लगातार बाघों का शिकार हो रहा था , तस्कर जंगलों से खाल निकालने में सफल हो रहे थे और कई मामलों का खुलासा हुआ , तो क्या इसकी जिम्मेदारी केवल मैदानी कर्मचारियों तक ही सीमित है ? क्या पूरे वन्यजीव संरक्षण तंत्र की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भी जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए ?
छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण (wildlife protection) की प्रशासनिक व्यवस्था कई स्तरों पर काम करती है….
सबसे ऊपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) होते हैं , जो राज्य के वन विभाग के सर्वोच्च तकनीकी अधिकारी होते हैं। वन्यजीव संरक्षण और राष्ट्रीय उद्यानों , अभ्यारण्यों तथा टाइगर रिज़र्व की निगरानी के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी)/PCCF (wildlife) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनके अधीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (chief wildlife warden) की वैधानिक जिम्मेदारियां भी निभाई जाती हैं। इसके बाद फील्ड डायरेक्टर , मुख्य वन संरक्षक, वन संरक्षक , उप वनमण्डलाधिकारी , रेंजर , डिप्टी रेंजर , वनरक्षक और मैदानी अमला संरक्षण व्यवस्था को लागू करता है।
यानी किसी टाइगर रिज़र्व में लगातार शिकार की घटनाएं सामने आती हैं , तो जांच केवल घटनास्थल तक सीमित नहीं रहती , बल्कि पूरी संरक्षण व्यवस्था के ऊपर भी सवाल खड़े होते हैं।

बाघ भारत की राष्ट्रीय धरोहर हैं। उनका संरक्षण केवल वन संरक्षकों की जिम्मेदारी नहीं , बल्कि पूरे संस्थागत तंत्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। वैसे भी छत्तीसगढ़ राज्य में विभागों में पदस्थ बड़े अधिकारियों के ऊपर ग़ाज़ गिरने के मामले बहुत ही कम देखने को मिलते हैं । ज्यादातर मामलों में छोटे कर्मचारी ही बलि का बकरा बनते हैं।
बहरहाल नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत , पामगढ़ विधायक शेषराज हरबंस और बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने इंद्रावती टाइगर रिज़र्व में बाघों के शिकार मामले में विधानसभा में प्रस्ताव लाकर बहुत ही संवेदनशील और गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि राज्य सरकार , वन विभाग और आवश्यकता पड़ने पर NTCA (national tiger conservation authority) इस मामले पर क्या कदम उठाते हैं।
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