बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि इसी विभाग की एक महत्वपूर्ण सिंचाई योजना (किसानों के लिए) पर गंभीर शिकायतें सामने आती हैं और लंबे समय तक उनकी निष्पक्ष जांच नहीं होती , तो यह केवल एक विभाग का मामला नहीं बल्कि शासन की जवाबदेही का प्रश्न भी बन जाता है।
बिलासपुर जिले के कोटा संभाग की आमामुड़ा डायवर्शन स्कीम (लगभग 16 करोड़ , extra work को मिलाकर) का उद्देश्य किसानों के लिए लगभग 1200 हेक्टेयर कृषि भूमि तक सिंचाई पहुंचना बताया गया है। लेकिन abc newz की टीम के निरीक्षण के बाद कैनल के bed level , निर्माण गुणवत्ता और वास्तविक सिंचाई क्षमता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

यदि कैनल का स्तर वास्तव में इतना नीचे है कि निर्धारित क्षेत्र तक पानी पहुंचना संभव नहीं है , तो करोड़ों रुपयों की इस परियोजना के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इन दावों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र तकनीकी जांच आवश्यक है।
इस पूरे प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग और निर्माण का जिम्मा EE , SDO और sub engineer स्तर के अधिकारी कर रहे हैं ।EE द्वारका प्रसाद जायसवाल की शिकायत सचिव , प्रमुख अभियंता , CE और SE स्तर के अधिकारियों से की गई है , लेकिन आज तक इन अधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट में हो रहे संभावित भ्रष्टाचार के मामले में गंभीरता नहीं दिखाई है। अगर ये हाल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के विभाग का है तो आप समझ गए होंगे कि बाकी विभागों का क्या हाल होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से है….
* क्या इस परियोजना का किसी स्वतंत्र एजेंसी से तकनीकी ऑडिट कराया जाएगा ?
* क्या शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी ?
* क्या दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्यवाही होगी ?
और सबसे महत्वपूर्ण बात… क्या किसानों को वास्तव में वह सिंचाई मिलेगी जिसके नाम पर यह परियोजना बनाई जा रही है ?

बिलासपुर जल संसाधन विभाग से एक और गंभीर बात सामने आ रही है , सूत्र बताते हैं कि कुछ साल पहले विभाग के प्रोजेक्ट्स में अधिकारियों द्वारा ठेकेदारों से लगभग 12% कमीशन की डिमांड की जाती थी , अब ठेकेदारों से 18% कमीशन की डिमांड की जा रही है। इस पूरे प्रकरण से ठेकेदारों में काफी रोष देखने को मिल रहा है जो आने वाले समय में गंभीर घटना का परिणाम हो सकता है। अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच बड़े टकराव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

सरकारी योजनाओं का मूल्य उनकी लागत से नहीं , बल्कि जनता को मिलने वाले वास्तविक लाभ से तय होता है। यदि किसी परियोजना में गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं , तो उनकी निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्यवाही ही जनता का विश्वास बनाए रख सकती है।
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