बिलासपुर : (छत्तीसगढ़) छत्तीसगढ़ के पामगढ़ विधानसभा क्षेत्र में विधायक शेषराज हरबंस (कॉन्ग्रेस) को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कलेक्टर जन्मजय महोबे और प्रभारी पुलिस अधीक्षक निवेदिता पॉल द्वारा रोके जाने का मामला अब राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बन चुका है। सवाल सिर्फ एक विधायक का नहीं है…. सवाल लोकतंत्र की गरिमा का है।
अगर जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि ही सरकारी कार्यक्रम में प्रवेश से रोका जाए…अगर अफसरशाही जनादेश से ऊपर दिखने लगे… तो सवाल उठना स्वाभाविक है – क्या लोकतंत्र सुरक्षित है ? पामगढ़ विधानसभा में जो हुआ, उसने केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर भी बहस छेड़ दी है।
पामगढ़ विधायक शेषराज हरबंस ने abc newz को बताया कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के जन चौपाल कार्यक्रम में आगमन के मामले में जांजगीर – चांपा के कलेक्टर जन्मजय महोबे और प्रभारी पुलिस अधीक्षक निवेदिता पॉल ने कहा कि मैडम आप इस कार्यक्रम में मत आइए, आपके आने से हमारी नौकरी को खतरा है, जिससे शेषराज हरबंस हतप्रभ रह गई। हरबंस का कहना है कि वो क्षेत्र की MLA है, और जनता के प्यार और आशीर्वाद से चुन कर आई हैं, तो फिर ये अफसरशाही इस तरह कैसे बात कर सकती है, यहीं से मामला तूल पकड़ता गया और तमाम मीडिया की सुर्खियां बनता गया।
भारत का संविधान लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखता। संविधान कहता है कि जनता का प्रतिनिधि जनता की आवाज़ होता है। एक विधायक यानी MLA सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता, वह हजारों–लाखों मतदाताओं की संवैधानिक अभिव्यक्ति होता है। ऐसे में यदि किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि को बिना वैधानिक कारण के सरकारी कार्यक्रम से रोका जाता है, तो यह कई गंभीर सवाल खड़े करता है …..
* क्या प्रशासन जनप्रतिनिधियों का सम्मान कर रहा है ?
* क्या अफसरशाही लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन कर रही है ?
* और सबसे बड़ा सवाल–क्या जनता के जनादेश का अपमान हुआ है ?
संविधान क्या कहता है ?
भारत का संविधान सीधे शब्दों में यह नहीं कहता कि किसी विधायक को हर कार्यक्रम में प्रवेश देना अनिवार्य है। लेकिन संविधान की मूल भावना– ” लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व ” – यह स्पष्ट करती है कि चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार होना चाहिए।
अनुच्छेद 14–समानता का अधिकार
भारत में हर व्यक्ति कानून के समक्ष समान है। यदि राजनीतिक दुर्भावना या पक्षपात के आधार पर किसी विधायक को रोका गया, तो यह समानता के सिद्धांत पर सवाल खड़ा करता है।
अनुच्छेद (19)(1)(a)
जनप्रतिनिधि को जनता की आवाज़ उठाने और सार्वजनिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार है।
संसदीय परंपराएं और लोकतांत्रिक मर्यादा
भारत की संसदीय व्यवस्था में यह स्थापित परंपरा रही है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों को सरकारी कार्यक्रमों में सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाए, क्योंकि वे जनता और सरकार के बीच संवैधानिक कड़ी होते हैं।
लोकतंत्र बनाम अफसरशाही
लोकतंत्र में अधिकारी संविधान के अधीन होते हैं, और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। इसलिए यदि कोई अधिकारी बिना उचित कारण के किसी विधायक को रोकता है , तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, यह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का प्रश्न बन जाता है।
हाँ, सुरक्षा कारण, प्रोटोकॉल या कानून व्यवस्था जैसी परिस्थितियों में प्रशासन को अधिकार होते हैं। लेकिन उन अधिकारों का उपयोग पारदर्शी, निष्पक्ष और सम्मानजनक होना चाहिए।
MLA शेषराज हरबंस के मामले में मुख्यमंत्री क्या कर सकते थे ?
* संबंधित अधिकारियों से तत्काल रिपोर्ट मांग सकते थे
* घटना की जाँच के आदेश दे सकते थे
* यदि किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध हो, तो कार्रवाई कर सकते थे
* जनप्रतिनिधियों के सम्मान को लेकर स्पष्ट प्रशासनिक निर्देश जारी कर सकते थे
* विधायक और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित कर सकते थे
MLA शेषराज हरबंस के मामले में अभी तक कोई भी सकारात्मक एक्शन नहीं लिया गया है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसी घटनाएं अगर समय रहते नियंत्रित नहीं हुईं, तो इससे ” अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधि ” की बहस और गहरी हो सकती है। लोकतंत्र में प्रशासन जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ समन्वय से चलता है , टकराव से नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है – क्या पामगढ़ की घटना पर सरकार कोई बड़ा एक्शन लेगी ? क्या प्रशासनिक जवाबदेही तय होगी ? और क्या लोकतांत्रिक गरिमा को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे ? फिलहाल पूरे छत्तीसगढ़ की नज़र इस मामले पर टिकी हुईं हैं।
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